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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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सप्तम लम्बक ९५ मेरी समझ से वह कामी निन्दनीय और प्रशंसनीय भी है। जिसने उसे छोड़ दिया है वह इतना कमनीय भी है कि वह उसके बिना प्राण देन जा रही है ॥११७॥ उसने चार वेद जाननेवाले मुझे वेदों की संख्यानुसार चार सोने के पुरुष के दान दिये ॥११८॥ उन्हें सत्रगृह बना करके स्वधर्म-सेवा में लगाना चाहता हूँ और चाहता हूँ कि आप उसके संरक्षक बनें ॥११९॥ उस ब्राह्मण के मुख से यह प्रियवार्ता सुनकर राजा विक्रमादित्य का मन मदनमाला ओर खिंच गया ॥१२ ॥ और, ब्राह्मण का कार्य करने के लिए प्रतीहार को आज्ञा देकर मदनमाला को दृढ़ प्रेमवाली और अपने लिए जीवन को तृण समान समझनेवाली जानकर अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करने में उत्कण्ठित राजा ने मदनमाला के जीवन को स्वल्प दिनों का समझकर शीघ्र ही मन्त्रियों पर राज्य-भार डालकर आकाश-मार्ग से राजा प्रतिष्ठान नगर को प्रस्थान किया और अपनी प्रेयसी के घर पहुँचा ॥१२१-१२३॥ वहाँ उसने चाँदनी से स्वच्छ वस्त्र पहने हुई अपने वैभव को ब्राह्मणों के लिए अर्पित की हुई दुर्बल मदनमाला को अमावस्या की चन्द्र-कला के समान देखा ॥१२४॥ वह मदनमाला भी आँखों के लिए अमृत-उत्सव के समान सहसा आए हुये राजा को देखकर क्षण-भर के लिए स्तब्ध एवं चकित-सी हो गई ॥१२५॥ तदनन्तर उसने उठकर राजा को मानों इसलिए बाहुपाश में बाँध लिया कि कहीं फिर भाग न जाय ॥१२६॥ और, 'हे क्रूर ! मुझ निरपराध ? को छोड़कर क्यों चले गये'—इस प्रकार आँसुओं से रुँधे कण्ठ से बोली-॥ १२७॥ 'आओ एकान्त में कहूँगा'—ऐसा कहकर राजा उसे घर के भीतर एकान्त में ले गया। राजा के आ जाने पर मदनमाला के परिवार (सेवक आदि ने) प्रसन्नता मनाई और राजा का अभिनन्दन किया ॥१२८॥ एकान्त में आकर राजा ने अपने को प्रकट करके उसे अपना वृत्तान्त सुनाया—जैसे कि वह राजा नरसिंह को जीतने के लिए पहले आया था ॥ १२९॥ और जैसे प्रपंचबुद्धि भिक्षु को मारकर आकाश में उड़ने की शक्ति प्राप्त की थी और जस कुबेर से वर प्राप्त करके उसे सोन के पुरुष प्रदान किये और जैसे ब्राह्मण द्वारा उसका समाचार सुनकर पुनः यहाँ आया—यह सारा वृत्तान्त राजा ने मदनमाला को विस्तार से सुना दिया ॥१३०-१३१॥