कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextसप्तम लम्बक १५ यह बात सारे अन्तःपुर में प्रसिद्ध हो गई है, यह सुनकर राजा चिन्तित हुआ और विचार करने लगा ॥२९॥ उसके बाद एक-एक रानी के पास गया और क्रमशः उन सब से पूछा। उन सभी रानियों ने कपट करके एक ही बात कही जो पहले से निश्चित कर चुकी थीं ॥३० ॥ तब उस बुद्धिमान् और सहिष्णु राजा ने सोचा— उन राजा के सम्बन्ध में ऐसी बात की सम्भावना तो नहीं है, किन्तु प्रवाद ऐसा हो गया है। इसलिए बिना पूर्ण निश्चय के मुझे यह रहस्य नहीं खोलना चाहिए। इस समय अन्तिम स्थिति देखने के लिए दाना को रोकना चाहिए ॥३१-३२॥ ऐसा निश्चय करके दूसरे दिन राजा ने रनिवास के अध्यक्ष मुरक्षित को दरबार में बुलाकर कोप प्रदर्शित करते हुए कहा—॥३३॥ 'रे पापी ! मैंने पता लगाया है कि तूने ब्रह्महत्या की है। इसलिए तीर्थयात्रा किये बिना तुझे मैं देखना नहीं चाहता' ॥३४॥ यह सुनकर घबराय हुए 'महाराज ! मैंने ब्रह्महत्या नहीं की' —ऐसा कहते हुए मुरक्षित से राजा ने फिर कहा—॥३५॥ 'पूछता न करो। पाप का नाश करनेवाले कश्मीर देश को जाओ। वहाँ विजय- क्षेत्र और पवित्र नन्दिक्षेत्र है ॥३६॥ और वहाँ वराह-क्षेत्र है। उन क्षेत्रों को भगवान् विष्णु ने पवित्र किया है। जिस देश में बहती हुई जाह्नवी (गंगा) वितस्ता नाम-धारक बनती है, जहाँ उत्तर-मानस नामक पवित्र स्थल है। इन तीर्थों की यात्रा करके पवित्र होकर मेरे पास आना—एम नहीं' ॥३७-३८॥ ऐसा कहकर उस बेचारे मुरक्षित को राजा वीरभुज ने तीर्थयात्रा के बहाने युक्तिपूर्वक दूर भेज दिया ॥३९ ॥ सब स्नेह, क्रोध और चिन्ता में पड़ा राजा गुणवरा रानी के समीप गया। वहाँ उसे विमनिमन देखकर व्याकुल रानी ने पूछा कि 'हे नरपुङ्गव ! आज सहसा आप मुख दुःखी क्यों हो?' ॥४०-४१॥ यह सुनकर राजा वीरभुज रानी से बनावटी बात बोला— 'हे महारानी ! किसी महाज्ञानी विद्वान् (ज्योतिषी) ने आकर मुझे कहा—॥४२॥ राजन् ! शनीश्वरादि ग्रह तुम पर क्रुद्ध हैं, निष्प्रजा (सन्तानहीन) दशा हो और अब इस प्रकारी दशा॥४३॥