कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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बेटा ! तुम्हारे पिता के अनेक पुत्र युवराज होकर चले गये। किसी ने भी राज्य नहीं पाया। सब ने केवल वृद्धता ही पाई ॥३२॥
नागार्जुनने इस राजा को ऐसा रसायन दिया है कि उस अपनी अवस्था का यह आठवाँ सैकड़ा चल रहा है। अभी जाने कितने ही युवराजों का अपने से अल्पायु करते हुए इस राजा की उम्र के कितने सैकड़े व्यतीत होंगे ॥३३॥
यह सुन दुःखित पुत्र को देखकर माता फिर बोली— यदि तुम्हें राज्य करना है तो एक उपाय यह करो। यह दाता मन्त्री नागार्जुन प्रतिदिन प्रातः स्नान सन्ध्या पूजन आदि से निवृत्त होकर भोजन के समय यह घोषणा करता है कि कौन याचक क्या-क्या चाहता है ? किसे क्या दिया जाय ? तुम उस समय उससे जाकर कहो कि तुम अपना शिर मुझे दो। वह सत्यवक्ता के शिर कटकर मर जाने पर उस के शोकसे राजा भी मर जायगा या जंगल में चला जायगा । तब तुम राज्य प्राप्त कर सकोगे और दूसरा कोई उपाय नहीं है। माता का यह सुझाव सुनकर युवराज सन्तुष्ट हुआ ॥३४—३९॥
'ऐसा ही करूँगा'—इस प्रकार कहकर उसने यही निश्चय किया। तुच्छ है कि राज्य का लोभ अपने आत्मीय बन्धु-बान्धवों के स्नेह का अतिक्रमण कर जाता है ॥४०॥
तदनन्तर दूसरे दिन राजकुमार जीवहर भोजन के समय नागार्जुन के घर गया ॥४१॥
'कौन क्या चाहता है ?' मन्त्री के इस प्रकार कहते ही राजकुमार ने उसका शिर माँगा ॥४२॥
वत्स ! आश्चर्य है कि मेरे इस शिर से तुम क्या करोगे ? यह तो मांस हड्डी और बालों का ढेर है। इसका तुम्हारे लिए क्या उपयोग है ? तो भी यदि तुम्हें इससे प्रयोजन है तो इसे ले लो। ऐसा कहकर मन्त्री ने उसके आगे अपनी गर्दन झुका दी ॥४३-४४॥
रसायन से सुदृढ़ (मजबूत) उसके गले पर प्रहार करते हुए युवराज की कितनी ही तल- वार टुकड़े-टुकड़े हो गई। तबतक इस समाचार को सुनकर आये हुए और चिन्ताकुल हो सिर से वस्त्र छूटे हुए राजा विस्मय से नागार्जुन से कहा—॥४५-४६॥