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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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तब दोनों का द्वन्द्व-युद्ध प्रारम्भ होने पर इन्दीवरसेन के द्वारा बार-बार काटा जाता हुआ भी उसका सिर फिर-फिर जुट जाता था ॥१३१॥

उस राक्षस की इस माया को देखकर उसके पास बैठी हुई और राजपुत्र पर आसक्त हुई कुमारी द्वारा इशारे से सूचित किये गये राजकुमार ने उसके सिर को काटकर तुरन्त ही एक खड्ग प्रहार से उसके दो टुकड़े कर डाले ॥१३२-१३३॥

कुमारी के द्वारा ज्ञात राक्षसी माया के नष्ट हो जाने पर उसका सिर फिर नहीं जुटा और वह मर गया ॥१३४॥

उस राक्षस के मरने पर वह सुन्दरी स्त्री और कुमारी दोनों प्रसन्न हो गई। तब छोटे भाई के साथ इन्दीवरसेन ने स्वस्थता से बैठकर पूछा—॥१३५॥

'इस एकमात्र द्वारपाल से रक्षित नगर में यह कैसा राक्षस था और तुम दोनों कौन हो जो उसके मारे जाने पर प्रसन्न हो रही हो ? ॥१३६॥

यह सुनकर उन दोनों में से कुमारी बोली—'इस दीसपुर में वीरभुज नाम का राजा था। यह उस राजा की मदनदंष्ट्रा नामकी पत्नी (रानी) है। इस राक्षस ने नगर में आकर राजा वीरभुज को खा डाला उसके अन्य कुटुम्बियों और सेवकों को भी खा लिया किन्तु यह सुन्दरी है इसलिए इसे नहीं खाया और अपनी पत्नी बना लिया ॥१३७-१३९॥

तब इस निर्जन नगर में सोने के भवन बनाकर बिना नौकर-चाकरों के ही यह इसके साथ आनन्द-विहार करता हुआ रहता था॥१४०॥

और, मैं इस राक्षस की खड्गदंष्ट्रा नाम की छोटी बहन हूँ। मैं तुम्हें देखकर तुमसे प्रेम करने लगी हूँ ॥१४१॥

इसलिए, इसके मरने पर यह और मैं दोनों प्रसन्न हुए। अब तुम मेरे ही मन के द्वारा माँग की गई मुझसे विवाह करो' ॥१४२॥

ऐसा कहती हुई खड्गदंष्ट्रा को इन्दीवरसेन ने गान्धर्व विधि से विवाहित कर लिया ॥१४३॥

और, खड्ग के प्रभाव से इच्छा करते ही अभिलषित भोगों को प्राप्त करता हुआ राजकुमार, अपने छोटे भाई के साथ वहीं रहने लगा ॥१४४॥

एक बार उसने अपने खड्ग के प्रभाव से आकाश-यान का ध्यान किया जिससे विमान बन कर आ गया ॥१४५॥ २१