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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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सप्तम लम्बक २१३ क्या देव ने उसी के लिए तुम्हें यहाँ ला दिया है? तुम मेरे ही घर पर तबतक ठहरो। फिर देखेंगे आगे क्या होता है'? ॥१७१॥ ऐसा कहकर वृद्धा के द्वारा भोजन कराया गया गोमुख के साथ नरवाहनदत्त ने वह रात्रि वहीं व्यतीत की॥१७२॥ प्रातः काल गोमुख के साथ एकान्त में अपना कर्त्तव्य-निर्धारण करके कमलेश्वर के पुत्र ने महाव्रती का वेश धारय किया ॥१७३॥ इस प्रकार का वेश बनाकर गोमुख को साथ लिये हुए 'हा हंसिनी' 'हा हंसिनी !— इस प्रकार बकता-भकता राजभवन के आस-पास घूमने लगा। जनता उनका तमाशा देखने लगी ॥१७३॥ इस प्रकार उसे देखकर राजभवन की दासियां आश्चर्यचकित होकर राजकुमारी कर्पूरिका से बोलीं—॥१७४॥ 'राजभवन के सिंहद्वार पर किसी महाव्रती युवा को हम लोगों ने देखा जो द्वितीय मित्र के साथ रहने पर भी सौन्दर्य में अद्वितीय है ॥१७५॥ वह स्त्रियों के लिए महापाशून मन्त्र के समान दिन-रात 'हा हंसिनी! हा हंसिनी! —इस प्रकार की रट लगाये हुए है ॥१७६॥ यह सुनकर पूर्वजन्म की हंसिनी उस राजकुमारी ने बड़े ही कौतुक से दासियों द्वारा उसे अपने समीप बुलाया ॥१७७॥ और अत्यन्त सुन्दर रूप से शोभित शंकर की शापव्यथा से पुनर्जीवित रूप कामदेव के समान उस (नरवाहनदत्त को) देखा ॥१७८॥ और, विस्मय से विस्फारित नेत्रों से उसे देखते हुए राजकुमारी बोली कि 'तुम 'हा हंसिनी ! हा हंसिनी! यह क्या बार-बार रट रहे हो? ॥१७९॥ राजकुमारी के ऐसा पूछने पर भी उसने उत्तर में 'ओ हा हंसिनी ! —यही कहा। तब उसके साथ गए हुए गोमुख ने कहा—'हे देवि ! मैं संक्षेप से कहता हूँ सुनो। यह अपने पूर्व योग से पहले जन्म में हंस था ॥१८०-१८१॥ उस जन्म में यह मदन-मञ्जरी किसी बड़े सरोवर के किनारे कमल-वृक्ष में अपना आवास बनाकर हंसिनी के साथ रहता था। वहीं पर दैवयोग से गरुड़ की मन्दरा में बच्चों का विनाश होने से दुःख भोगकर इसकी हंसिनी ने व्यथित होकर प्राण त्याग दे दिया ॥१८२-१८३॥ तब हंसनी के वियोग में दुखी होकर पक्षी जाति से विरक्त होकर हृदय से स्मरण किया—॥१८४॥