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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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सप्तम लम्बक २१९ राजा द्वारा दिये गये सोने आदि दहेज के ढेर, ऐसे मालूम होते थे मानो पार्वती का विवाह देखने के लिए सुमेरु और कैलास शिखर आकर बैठे हों ॥२१५॥ इस पर करोड़ों वस्त्र और आभूषणों से सजी हुई तीन सौ दासियाँ राजा कर्पूरक ने दहेज में दीं। तदनन्तर शरीरधारिणी प्रीति के समान कर्पूरिका से विवाहित नरवाहनदत्त उस नगर में रहने लगा ॥२१६-२१७॥ मालतीलता और वसंत के सुयोग के समान उन दोनों का समागम किसके आनन्द के लिए नहीं हुआ? ॥२१८॥ किसी एक दिन सफलमनोरथ नरवाहनदत्त ने कर्पूरिका से कहा कि 'चलो कौशाम्बी नगरी को चलें। तब वह बोली कि यदि चलना है, तो उसी आकाशगामी यान से क्यों न चलें? ॥२१९-२२ ॥ यदि वह छोटा हो तो उससे मैं दूसरा बड़ा विमान मँगाती हूँ। यहाँ पर (कर्पूरसंभव द्वीप में) प्राणधर नामका शिल्पी (बढ़ई) यन्त्रवाले विमानों का बनानेवाला रहता है ॥२२१॥ वह किसी दूसरे देश से आया है। तो मैं उससे दूसरा विमान बनवाती हूँ। ऐसा कहकर द्वारपाल को बुलाकर उसने प्राणधर को विमान बनवाने की आज्ञा प्रदान की—॥२२२॥ कि जाकर प्राणधर नामक शिल्पी से कहो कि हम लोगों के जाने के लिए आकाश में उड़नेवाला विमान बना दो ॥२२३॥ इस प्रकार सत्था¹ को आज्ञा देकर कर्पूरिका ने दासी के मुंह से अपने जाने की बात राजा के लिए कहलवाई ॥२२४॥ यह समाचार जानकर जैसे ही राजा वहाँ आता है नरवाहनदत्त अपने मन में सोचता है ॥२२५॥ यह प्राणधर नामक शिल्पी वही है, जो राज्यधर का भाई है। जो कांची-नरेश के भय से भागा था ॥२२६॥ ऐसा सोचते ही द्वारपाल से निवेदित राजा वहाँ आया और उसी समय वह प्राणधर शिल्पी भी वहाँ उपस्थित हुआ ॥२२७॥ और बोला— मैंने एक बड़ा वायुयान बनाकर रखा है जो अभी एक हजार व्यक्तियों को सहज ही ले जा सकता है ॥२२८॥ ऐसा कहते हुए शिल्पी प्राणधर का अभिनन्दन करते हुए नरवाहनदत्त ने आदर के साथ उससे पूछा—२२९॥ १ पार्श्ववर्ती सेवक।