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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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अष्टम लम्बक २३१ चन्द्रप्रभ नाम का वह राजा विश्व को आह्लाद देनेवाला अतएव समुचित नामवाला होने पर भी शत्रुओं के लिए अग्नि के समान सन्तापदायक था ॥१८॥ उस राजा की कीर्तिमती नाम की महारानी से अत्यन्त शुभ लक्षणों से भूषित उत्कर्षवाला प्रभावशाली पुत्र उत्पन्न हुआ ॥१९॥ ‘यह सूर्यप्रभ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ है, जिसे शंकर भगवान् ने पहले से ही विद्याधरों का भावी चक्रवर्ती बनाया है' ॥२०॥ उसके उत्पन्न होने पर राजा चन्द्रप्रभ के कानों के लिए अमृत-वर्षा के समान इस प्रकार स्पष्ट आकाशवाणी हुई ॥२१॥ तदनन्तर, शिवजी की कृपा से अत्यन्त उत्सव-युक्त चन्द्रप्रभ के राजगृह में वह सूर्यप्रभ क्रमशः बड़ा होने लगा ॥२२॥ तीव्रबुद्धि वह सूर्यप्रभ बालकपन में ही क्रमशः गुरुओं की उपासना से सभी विद्याओं और कलाओं में पारंगत होगया ॥२३॥ अपने गुणों से प्रजा को आकृष्ट करनेवाले सोलह वर्ष के उस कुमार सूर्यप्रभ को पिता चन्द्रप्रभ ने युवराज-पद पर अभिषिक्त कर दिया ॥२४॥ और, अपने मन्त्रियों के पुत्र भास प्रभास सिद्धार्थ प्रहस्त आदिको कुमार के लिए मन्त्री नियुक्त कर दिया ॥२५॥ जब सूर्यप्रभ उन मन्त्रिपुत्रों के साथ युवराज का कार्य कर रहा था इसी बीच एक बार मय नामक असुर वहाँ आया ॥२६॥ आतिथ्य-सत्कार कर लेने के उपरान्त महासुर ने सूर्यप्रभ के साथ दरबार में बैठे हुए चन्द्रप्रभ से कहा—॥२७॥ ‘राजन्, शिवजी ने तुम्हारे इस पुत्र सूर्यप्रभ को विद्याधर-राजाओं का भावी चक्रवर्ती नियुक्त किया है ॥२८॥ तो यह सूर्यप्रभ उस विद्याधर-चक्रवर्ती के पद को प्राप्त करानेवाली विद्याओं को क्यों नहीं सिद्ध करता' इसीलिए शिवजी ने मुझे भेजा है॥२९॥ आप आज्ञा दीजिए कि मैं उसे ले जाकर विद्याधर चक्रवर्ती के पद की साधक विद्याओं को सिद्ध करने की क्रिया उसे सिखा देता हूँ ॥३०॥ इस सूर्यप्रभ का विरोधी विद्याधरों का सम्राट् श्रुतशर्मा है जिसे इन्द्र ने बनाया है ॥३१॥ १