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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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अष्टम लम्बक २७१ वहाँ भी जब उसका असह्य तेज उसी प्रकार प्रज्वलित हुआ तब इन्द्र ने उसकी तपस्या में विघ्न करने के लिए उसके पास अप्सराओं को भेजा ॥८९॥ किन्तु, उस ब्राह्मण ने उन्हें तृण के समान समझकर उनकी उपेक्षा कर दी तो उस विप्र के पास देवताओं ने मृत्यु को भेजा ॥९०॥ मृत्यु ने उससे कहा हे ब्राह्मण मनुष्य इतने दिनों तक नहीं जीते इसलिए इस आत्मा को छोड़ो और ईश्वरीय मर्यादा का उल्लंघन मत करो ॥९१॥ यह सुनकर ब्राह्मण ने कहा कि 'यदि मेरे आयुष्य की अवधि पूर्ण हो गई, तो मुझे क्यों नहीं ले जाता प्रतीक्षा क्यों कर रहा है। हे पाशवाले मैं स्वयं प्राणों को न छोडूंगा। इस प्रकार, अपनी इच्छा से शरीर छोड़नेवाला मैं आत्मघाती बनूँगा ॥९२-९३॥ इस प्रकार कहते हुए उस ब्राह्मण को तप-प्रभाव के कारण जब काल न ले जा सका तब वह विवश होकर जहाँ से आया था वहीं लौट गया ॥९४॥ तब इन्द्र को पश्चात्ताप हुआ और वह काल को जीतनेवाले उस ब्राह्मण को बलपूर्वक अपने हाथों से उठाकर स्वर्ग में ले गया ॥९५॥ स्वर्ग में जाकर भी उसके भोगों से विरक्त और जप में लीन उस ब्राह्मण को देवताओं ने पृथ्वी पर उतार दिया। वह ब्राह्मण फिर हिमालय की ओर चला गया ॥९६॥ वहाँ पर इन्द्र आदि देवताओं ने बार-बार वर माँगने के लिए उससे कहा। किन्तु, उसने एक न मानी। इतने में ही उस मार्ग से राजा इक्ष्वाकु आ निकला ॥९७॥ उसने देवताओं से सब समाचार जानकर उस जापक ब्राह्मण से कहा— यदि तुम देवताओं से वर नहीं लेते हो तो मुझसे माँगो ॥९८॥ यह सुनकर जापक ब्राह्मण हँसकर बोला कि 'जब मैं देवताओं से भी वर नहीं माँग रहा हूँ तब तुझे क्या वर देने का सामर्थ्य है' ॥९९॥ ऐसा कहते हुए ब्राह्मण से राजा इक्ष्वाकु ने कहा कि यदि मैं वर देने में असमर्थ हूँ तो तू ही मुझे वर दे दे' ॥१००॥ तब वह जापक ब्राह्मण कहने लगा— माँग जो वर तू चाहता है मैं अवश्य ही दूँगा।' यह सुनकर राजा मन में सोचने लगा कि 'मैं देता हूँ और यह ब्राह्मण लेता है यह क्रम तो उचित है किन्तु यह विपरीत क्रम है कि यह दे और मैं लूँ' ॥१०१-१०२॥