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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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अष्टम लम्बक २४१ 'मुझे इन्द्र ने भेजा है। उसने आप लोगों से कहा है कि सुनीथ की पुनःप्राप्ति से मुझे परम सन्तोष हुआ ॥१६४॥ इसलिए अब फिर बिना कारण बैर न करो और मेरे पक्ष के श्रुतशर्मा से भी विरोध न करो' ॥१६५॥ इस प्रकार, इन्द्र का सन्देश सुनाते हुए नारद मुनि से प्रह्लाद ने कहा—'सुनीथ के पुनर्जीवन से इन्द्र को सन्तोष हुआ यह अनुचित नहीं है। किन्तु, हम अकारण विरोध नहीं कर रहे हैं। आज ही हमने अपने गुरु के सामने प्रतिज्ञा की है ॥१६५, १६६॥ श्रुतशर्मा, यदि इन्द्र के पक्ष का आधार लेकर हमारे विरुद्ध चलता है, तो इसमें हमारा क्या दोष ? सूर्यप्रभ के पक्षपाती देवताओं के देव महादेव ने उससे विद्याधर चक्रवर्ती होने का आदेश दिया है; क्योंकि इसने बहुत पहले उनकी आराधना की थी ॥१६७-१६८॥ इस प्रकार ईश्वर के आदेश से प्राप्त इस कार्य में हम क्या करें। इसलिए, इन्द्र का ऐसा कहना अकारण और असंगत है' ॥१६९॥ दानवेन्द्र प्रह्लाद से इस प्रकार कहे गये नारद मुनि इन्द्र को कोसते हुए अन्तर्हित हो गये ॥१७०॥ उसके बाद पर शुक्राचार्य ने दानवेन्द्र प्रह्लाद से कहा—'इस काम में इन्द्र की शत्रुता स्थिर मालूम होती है किन्तु महादेव के हमारे पक्ष में दृढ़तापूर्वक स्थिर रहने पर वह क्या करेगा ? विष्णु पर उसकी आशा व्यर्थ है उससे क्या होना है ? ॥१७१, १७२॥ शुक्राचार्य की इन बातों का दानवों ने अनुमोदन किया और बलि तथा प्रह्लाद से आज्ञा लेकर वे सब अपने-अपने घर गये ॥१७३॥ इसके बाद प्रह्लाद के चौथे पाताल में अपने घर जाने पर राजा बलि भी सभा-भवन से उठकर अपने भवन को चले गये ॥१७४॥ उनके जाने पर सुनीथ सूर्यप्रभ आदि सभी राजा बलि को प्रणाम करके उसी समय अपने घर आ गये ॥१७५॥ वहाँ आकर व भोजन-पान आदि के समय उनके साथ सम्मिलित होकर उनकी माता कीर्तिमती ने उनसे कहा —॥१७६॥ 'बेटा तुम यह तो जानते ही हो कि तुम्हारी ये पत्नियाँ बड़ों की बेटियाँ हैं जिनमें तेजस्विनी पताकिन कुबेर की मन्नावती गंधर्वराज तुम्बुरु की कन्या है ॥१७७॥ ११