कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextअष्टम लम्बक ॥ ५ किन्तु अगली दरीचे में तो वह अमृतप्रभ प्रह्लाद की कन्या मदिरावती के साथ रहता था ॥३४३॥ एक बार रात्रि के समय बातचीत के प्रसंग में सूर्यप्रभ ने सुशीला मदिरावती से पूछा— प्रिय उस दिन रात में तेरे साथ जो सहेलियाँ आई थीं वे कौन और कहाँ की थीं अब उन्हें मैं नहीं देख रहा हूँ। वे कहाँ गईं ॥३४४-३४५॥ यह सुनकर मदिरावती ने कहा—अच्छा किया मुझे स्मरण करा दिया। वे दो ही नहीं अपितु वे मेरी बारह रूपवाली सहेलियाँ हैं ॥३४६॥ उन्हें मेरे चाचा स्वयं में आहरण करके लाये थे। उनमें एक अमृतप्रभा और दूसरी यशिनी ये दोनों पर्वत मुनि की कन्याएँ हैं। तीसरी कान्ति और चौथी मूर्ति या तथा पाँचवीं गन्धर्व मलयना- वानी सत्यभामा ये तीनों महामुनि देवल की कन्याएँ हैं। छठी सौदामिनी नाम्नी उग्रतपस् व पांता हाहा नाम के गन्धर्व की कन्याएँ हैं। आठवीं पीवरा हूहू नाम के गन्धर्व की कन्या है। नवीं पान्त की मंजिष्ठा नाम की कन्या है ॥३४७-३५१॥ इनमें से उन्मत्त पतङ्गी ये दो रूपवती हैं। ग्यारहवीं कम्बल की कन्या भामिनी है और महोरगा नाम की बारहवीं कन्या चक्षु की है जो नागराज से उत्पन्न हुई है। ये सभी मेरे विवाह के समय मेरे रथागार में ले आई गईं। उन्हें मैं तुम्हारे लिए दूँगी जिससे मैं उनके साथ रहकर सदा सुखी रह सकूँ ॥३५२ -३५४॥ दैव उन सबों सदृश स्त्री की है और पुरुष रूप भी इसी प्रकार का है। यह आनन्द दे के लिये त्रिलोकी में भी कहा था किन्तु उन्होंने भाई की उपेक्षा करके अपना इस प्रकार [L20: तिरस्कार किया ॥ यह सुनकर सूर्यप्रभ ने कहा—प्रिये वे सब कहाँ हैं? मुझे तुम दिखलाओ। मदिरावती ने वैसा ही किया ॥