कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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और यह मय उसकी सब प्रकार की सहायता के लिए सन्नद्ध है। यह सुनकर दिति और दनु के साथ प्रजापति कश्यप ने इन्द्र से कहा—'इन्द्र तुम्हें श्रुतशर्मा प्यारा है और शिवजी का प्यारा सूर्यप्रभ है। यद्यपि मैं नहीं चाहता फिर भी शिवजी ने मय को आज्ञा दी है, तो अब तुम्हीं बताओ इसमें मय का क्या दोष है ? यह मय धर्म-मार्ग पर चलनेवाला और ज्ञान-विज्ञान युक्त है और गुरुओं के आगे विनम्र है। यदि तुम इसका अहित करते तो मेरी क्रोधाग्नि तुम्हें भस्म कर देती ! तुम इसके ऊपर अपनी सामर्थ्य नहीं दिखा सकते। क्या तुम इसके प्रभाव को नहीं जानते ? ॥३९७–४ ॥
पत्नियों-सहित मुनि के ऐसा कहने पर और इन्द्र के लज्जा से मुँह नीचा कर लेने पर इन्द्र की माता अदिति बोली—'श्रुतशर्मा कैसा है ? उसे लाकर दिखलाओ तो सही' ॥४ १॥
ऐसा सुनकर इन्द्र ने मातलि को उसी क्षण वहाँ बुलाकर आज्ञा दी और विद्याधरों के चक्रवर्ती श्रुतशर्मा को वहीं बुलाया। प्रणाम करते हुए श्रुतशर्मा और सूर्यप्रभ को देखकर कश्यप ऋषि की पत्नियों ने कश्यप प्रजापति से पूछा-'इन दोनों में सुन्दर रूप और लक्षणोंवाला कौन है ? ॥४ २४ ॥॥
तदनन्तर कश्यप मुनि ने कहा—'यह श्रुतशर्मा सूर्यप्रभ के मन्त्री प्रभास के भी समान नहीं है। इस अनुपम सूर्यप्रभ के समान यह कहाँ से हो सकता है' ॥४ ४॥
सूर्यप्रभ तो उन कलाओं से युक्त है, जिससे कि उद्योग करने पर उसे इन्द्रत्व की प्राप्ति भी दुर्लभ नहीं है ॥४ ५॥
इस प्रकार कश्यप ऋषि के वचन पर सबने श्रद्धा प्रकट की। तब महर्षि ने इन्द्र के सुनते हुए मय को यह वरदान दिया—॥४ ६॥
'हे पुत्र इन्द्र के शस्त्र उठा लेने पर भी तूने जो सहिष्णुता दिखलाई अर्थात् तनिक भी क्रोध या लेशमात्र भी विकार प्रकट नहीं किया इस कारण तेरे सभी अंग वज्रमय हो जायेंगे। और तू कभी मारा नहीं जायगा। तेरे ये दोनों पुत्र सुग्रीव तथा सूर्यप्रभ भी महाबलशाली और शत्रुओं के लिए सदा अजेय रहेंगे ॥४ ७ ४ ८॥
यह सुवासुकुमार, जो चन्द्रमा के समान सुन्दर मेरा पुत्र है आपत्ति के समय या रात्रि के समय ध्यान करते ही उपस्थित होकर तुम्हारी सहायता करेगा ॥४ ९॥
मुनि के ऐसा कहने पर उनकी पत्नियों अन्य ऋषियों तथा लोकपालों ने उसी सभा में मय आदि को वरदान दिये ॥४१०॥ ४