कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextअष्टम लम्बक १६९ क्रोध से खड्ग लेकर दौड़ते हुए उन दोनों में महासेन व्याकुल होकर भूमि में फिसलने के कारण गिर गया ॥८९॥ गिरे हुए राजा पर राजा विक्रमशक्ति के खड्ग-सहित हाथ को गुणशर्मा ने चक्र से काट डाला और तदनन्तर लोहे के डंडे से उसे मार डाला। महासेन उठकर और यह देखकर अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ और बोला—हे विप्रवीर, क्या कहूँ यह पाँचवीं बार तुमने मेरी प्राण-रक्षा की ॥९०-९२॥ गुणशर्मा से विक्रमशक्ति के मारे जाने पर, महासेन ने विक्रमशक्ति की सेनाओं और उसके राष्ट्र पर आक्रमण करके विजय प्राप्त की ॥९३॥ गुणशर्मा की सहायता से उसने अन्यान्य राजाओं पर भी आक्रमण करके और उन्हें अधीन करके महासेन उज्जयिनी लौट आया ॥९४॥ उधर उत्कण्ठिता रानी अशोकवती गुणशर्मा से बार-बार आग्रहपूर्वक प्रार्थना करने से रुकती न थी ॥९५॥ किन्तु, गुणशर्मा ने उसकी प्रार्थना किसी प्रकार स्वीकार न की। सच है, सज्जन व्यक्ति मरना स्वीकार करते हैं किन्तु दुराचार नहीं ॥९६॥ अशोकवती ने भी गुणशर्मा के दृढ़ निश्चय को देखकर उससे शत्रुता ठान ली। वह एकबार बनावटी खेद का-सा मुंह बनाकर और रोने का-सा मुंह लेकर पड़ी थी ॥९७॥ महासेन ने आकर यह देखा और पूछा—'प्रिये क्या बात है, तुम्हें किसने क्रुद्ध किया है, मुझे बताओ मैं अभी उसके धन और प्राणों का विनाश करता हूँ ॥९८-९९॥ इस प्रकार कहते हुए राजा से रानी ने बड़े ही कष्ट से कहा—'यह कोई ऐसी बात नहीं है कि जिसके प्रकट करने से कोई लाभ हो ॥१००॥ जिसने मेरा अपकार किया है, तुम उसे दंड देने में समर्थ नहीं हो। तथापि आर्यपुत्र यदि तुम्हारा आग्रह ही है तो सुनो, कहती हूँ ॥१०१॥ गुणशर्मा गौडेश्वर से धन लेने की इच्छा से उसके साथ षड्यन्त्र करके छल से भीतर ही भीतर तुमसे द्रोह करता था। इस नीच ब्राह्मण ने गौडेश्वर को राजा बनाने के लिए गुप्त दूत भेजा था ॥१०२-१०३॥