कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
Page 454 of 1079
Read in contextअष्टम लम्बक ४१९ महेश्वर से अग्निकुंड से अग्नि से शर के वन से और कृत्तिकाओं से जिस स्वामी कार्तिकेय का विचित्र जन्म हुआ है, जिसने उत्पन्न होते ही अपने प्रचंड तेज से समस्त संसार को आनन्दित करके दुर्जय तारकासुर को मारा उस कार्तिकेय का मन्त्र मुझसे लो। इस प्रकार कहकर अग्निदत्त ने पुण्यशर्मा को मन्त्र-दीक्षा दी ॥२३९–२४१॥ उस पुण्यशर्मा ने सुन्दरी से सेवित होकर नियमित रूप से उस भू-गृह में उस मन्त्र द्वारा स्वामी कार्तिकेय की आराधना की ॥२४२॥ कुछ दिनों के उपरान्त भगवान् षडानन ने प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष होते हुए आज्ञा दी—'बेटा तुम पर मैं प्रसन्न हूँ वर माँगो' ॥२४३॥ २४४वां श्लोक त्रुटित है। पुण्यशर्मा द्वारा अभीष्ट वर माँगने पर षडानन ने कहा—'पुत्र ! तू अनन्त धन का स्वामी होकर और महासेन को जीतकर निष्कंटक पृथ्वी का राज्य करेगा' ॥२४५॥ इस प्रकार, माँग से भी अधिक वर प्रदान कर स्वामी कार्तिकेय अन्तर्हित हो गये और तदनन्तर पुण्यशर्मा को भी अक्षय धन की प्राप्ति हुई ॥२४६। अनुष्ठान की सिद्धि होने पर पुण्यशर्मा ने अपने महत्त्व और प्रभाव के अनुकूल समझकर चिरकालीन सेवा-सहवास से आसक्त अग्निदत्त की रूपवती कन्या सुन्दरी का मानो साक्षात् भावी कार्यसिद्धि के समान विधिपूर्वक पाणिग्रहण कर लिया ॥२४७॥ अक्षय धन-कोष की प्राप्ति के प्रभाव से प्रचुर हाथी घोड़े और पदातियों की सेना से युक्त पुण्यशर्मा ने शस्त्र के प्रभाव से मिलाए हुए दूसरे राजाओं की सेनाओं से भी उज्जयिनी नगरी को घेरते हुए उस पर आक्रमण कर दिया ॥२४८॥ उसने उज्जयिनी में जाकर रानी अशोकवती के दुराचार की घोषणा करके और युद्ध में राजा महासेन को जीतकर राज्य का अधिकार प्राप्त किया ॥२४९॥ राज्य प्राप्त कर और अन्य राजाओं की कन्याओं से विवाह करके समुद्र के तट तक राज्य का विस्तार करके सम्राट् पुण्यशर्मा उस सुन्दरी के साथ चिरकाल तक सांसारिक भोगों का निरन्तर उपभोग करने लगा ॥२५ ॥