BharatKosha
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

Page 530 of 1079

Read in context
Page 530

नवम लम्बक ४९१ स्थूलभुज विद्याधर की कथा "हिमालय पर्वत पर मदनपुर नाम का उत्तम नगर है। वहाँ प्रलम्बभुज नामक विद्याधरों का राजा है। उससे स्थूलभुज नाम का एक पुत्र उत्पन्न हुआ यौवन-अवस्था को प्राप्त वह अति सुन्दर और भव्य आकृतिवाला हुआ ॥६९-७०॥ तदनन्तर, सुरभिदत्त नाम का विद्याधरों का स्वामी अपनी कन्या के साथ प्रलम्बभुज के घर पर आकर बोला-'यह सुरभिदत्ता नाम की मेरी कन्या है। यह मैंने तुम्हारेपुत्र स्थूलभुज को प्रदान की है। अतः वह इसके साथ विवाह करे' ॥७१-७२॥ यह सुनकर और सम्बन्ध को स्वीकार करके प्रलम्बभुज ने अपने पुत्र स्थूलभुज को बुलाकर उससे यह बात कह दी ॥७३॥ तब वह स्थूलभुज रूप के घमंड में आकर बोला-'पिताजी मैं इससे विवाह न करूँगा क्योंकि यह रूप में मध्यम है' ॥७४॥ 'बेटा बहुत अच्छे रूप से क्या करना है? उच्च वंश की यह कन्या मान्य है। पिता ने इसे दिया और मैंने तुम्हारे लिए ले लिया।' अब तुम इधर-उधर न करो' ॥७५॥ पिता द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर भी स्थूलभुज ने उसकी बात न मानी तो पिता ने क्रुद्ध होकर उसे शाप दिया—॥७६॥ 'अब तू अपने रूप के घमंड के दोष से मर्त्यलोक में उत्पन्न हो। मनुष्य-लोक में तू भयानक रूप और आकृतिवाला होगा ॥७७॥ तू शाप से च्युत अशोकमाला नाम की पत्नी को हठपूर्वक प्राप्त करेगा वह तुझे न चाह कर छोड़ देगी। इससे तुझे वियोग-दुःख प्राप्त होगा। जब वह दूसरों से प्रेम करेगी तब तू उसके वियोग-दुःख से अत्यन्त दुर्बल हो जायगा और प्रेम से मोहित होकर अग्निदाह आदि पाप करेगा' ॥७८-७९॥ पुत्र को इस प्रकार शाप देते हुए प्रलम्बभुज के चरणों में गिरकर रोती हुई सुरभिदत्ता कहने लगी—'मेरे अपराध से एकमात्र मेरे पति को ही शाप का दुःख न हो अतः मेरे लिए भी आज्ञा कीजिए' ॥८०-८१॥ ऐसा कहती हुई उस साध्वी सुरभिदत्ता को धैर्य देते हुए प्रसन्न प्रलम्बभुज ने स्थूलभुज के शाप का इस प्रकार अन्त किया—॥८२॥