कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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जब अशोकमाला का शाप-मोक्ष होगा तभी यह भी जाति-स्मरण करके शाप से मुक्त हो जायगा ॥८३॥ और पुनः अपने विद्याधर-शरीर को प्राप्त कर शाप का स्मरण करते हुए अभिमान रहित होकर शीघ्र ही तुझसे विवाह करेगा और तेरे साथ सुखपूर्वक रहेगा' ॥८४॥ प्रलम्बभुज के इस प्रकार कहने पर उस पतिव्रता ने किसी प्रकार धीरज धारण किया। अतः आपलोग मुझे वही शापमुक्त स्थूलभुज समझें ॥८५॥ मैंने अभिमान के कारण यह दुःख प्राप्त किया। सच है अभिमानी पुरुषों का जाने या अनजाने कल्याण कैसे हो सकता है? ॥८६॥ 'आज मेरा वह शाप समाप्त हुआ' ऐसा कहकर स्थूलभुज ने मानव-शरीर का त्याग कर दिव्य विद्याधरकुमार का रूप धारण किया ॥८७॥ और, अपनी विद्या के प्रभाव से अशोकमाला के शव को अदृश्य रूप से ही गंगा में प्रवाहित कर दिया तथा विद्या के प्रभाव से मँगाये गये गंगाजल से अलंकारवती के श्राद्ध-मज्जन को धो दिया ॥८८-८९॥ एवं अपने भावी स्वामी नरवाहनदत्त को प्रणाम करके अपनी कार्य-सिद्धि के लिए आकाश में उड़ गया ॥९०॥ इस घटना के कारण वहाँ बैठे हुए सभी लोगों के आश्चर्य चकित हो जाने पर गोमुख ने अनंगरति की कथा प्रारम्भ की ॥९१॥ अनंगरति की कथा इसी पृथ्वी पर यथार्थ नामवाला शूरपुर नगर है। वहाँ महावराह नाम का अत्यन्त बलशाली राजा था ॥९२॥ सन्तानहीन उस राजा को पद्मरति नाम की रानी से अनंगसुन्दरी नाम की कन्या उत्पन्न हुई ॥९३॥ कालक्रम से युवावस्था में चढ़ी हुई रूपवती अनंगरति ने अनेक राजाओं के माँगने पर भी किसी को पति बनाना स्वीकार नहीं किया ॥९४॥ और, दृढ़ निश्चय के साथ कहा कि जो शूर-वीर, रूपवान् तथा किसी विशेष विज्ञान का वेत्ता होगा उसे ही मैं अपने को दूँगी ॥९५॥ कुछ समय के अनन्तर राजकुमारी का समाचार सुनकर उसकी इच्छा से विवाह करने के लिए दक्षिणापथ से चार वीर, राजा महावराह के पास आये ॥९६॥