कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
Page 550 of 1079
Read in context[Page Header] अष्टम लम्बक ५११
[Page Body] वह अनंगप्रभा भी सुन्दर राजा को देखकर, कामदेव के बाणों का लक्ष्य बन गई और अपने मन में सोचने लगी— ॥२ ०॥ यह कौन है? क्या यह धनुषहीन कामदेव है अथवा मेरे गात्र या स्तुति से सन्तुष्ट शिव का मुझपर मूर्त्तिमान् अनुग्रह है ॥२ १॥ ऐसा सोचकर काम-मोहिता अनंगप्रभा ने उससे पूछा—'तुम कौन हो और इस वन में कैसे आये हो बताओ' ॥२ २॥ तब राजा जहाँ जैसे आया था वह सब उसे उसने बताया और राजा ने भी उससे पूछा—'सुन्दरि, तू कौन है? मुझे बता ॥२ ३॥ हे कमलनयनी यहाँ यह जो सो रहा है, यह कौन है। ऐसा पूछते हुए राजा को अनंग प्रभा ने संक्षेप में सब वृत्तान्त सुना दिया ॥२ ४॥ मैं विद्याधरी हूँ और यह खड्गसिद्ध मानव मेरा पति है। किन्तु, मैं तुम्हें देखते ही तुम्हारे प्रति अनुरागिणी हो गई हूँ। तो आओ। शीघ्र ही तुम्हारे नगर को चलें। जबतक यह जागता नहीं तबतक तुम्हें विस्तार से सब समाचार सुनाती हूँ' ॥२ ५–२ ६॥ राजा ने उसका प्रस्ताव सुनकर और उसे स्वीकार करके माना तीनों लोकों का राज्य पा लिया ॥२ ७॥ अनंगप्रभा ने राजा को गोद में रखकर, क्या वेग से आकाश में उड़ जाऊँ—ऐसा शीघ्र ही मन में सोचा ॥२ ८॥ इतने में ही वह पति-विद्रोह के कारण भ्रष्ट विद्यावाली हो गई, अर्थात् अपनी विद्याओं को भूल गई। तब पिता के शाप का स्मरण करती हुई वह अत्यन्त दुःखी हो गई ॥२ ९॥ उसे दुःखी देखकर और उसका कारण पूछकर राजा ने उससे कहा—यह शोक करने का समय नहीं है, तेरा पति जग जायगा ॥२१०॥ प्रिये यह बात तो दैवाधीन है। इस पर सोच न करो। अपने सिर की छाया और दैव की गति का कौन उल्लंघन कर सकता है? ॥२११॥ तो आओ अब चलें'—ऐसा कहकर उस पर विश्वास करती हुई अनंगप्रभा को राजा ने शीघ्रता से गोद में उठा लिया ॥२१२॥ तब माना गड़ा हुआ खजाना प्राप्त किया हुआ-सा वह राजा शीघ्र ही जाकर अपने रथ पर चढ़ गया और सेवकों ने उसका अभिनन्दन किया ॥२१३॥ वह राजा मन के समान शीघ्रगामी उस रथ से उस रमणी के साथ प्रजाओं को कौतुक देता हुआ अपनी राजधानी में जा पहुँचा ॥२१४॥