कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextनवम लम्बक ५२१ तदनन्तर, अनंगप्रभा पुरुष का वेष धारण कर एक अत्यन्त अंतरंग दासी के साथ नाट्याचार्य के घर पर गई ॥२७५॥ तब उसी समय नाट्याचार्य ने सारी धन-सम्पत्ति ऊँट की पीठ पर लाद दी और अनंग- प्रभा पुरुष के वेष में घोड़े पर सवार होकर नाट्य-शिक्षक के साथ निकल गई ॥२७६॥ उसने पहले विद्याधर की लक्ष्मी का परित्याग करके राजलक्ष्मी को स्वीकार किया उसके उपरान्त गान-नाचनेवाले चारण का आश्रय लिया। स्त्रियों के इस प्रकार चंचल मन को धिक्कार है! ॥२७७॥ अनंगप्रभा नाट्याचार्य के साथ जाकर क्रमशः विशाखपुर नामक नगर में पहुँची और वहाँ नाट्याचार्य के साथ सुख और स्वतन्त्रतापूर्वक रहने लगी ॥२७८॥ उस नाट्याचार्य ने उस सुन्दरी स्त्री को प्राप्त कर अपने गन्धर्वजन्म को सार्थक समझा ॥२७९॥ उधर राजा हरिवर अनंगप्रभा को कहीं भागी हुई जानकर उसके शोक से अपना शरीर त्याग करने को तैयार हुआ ॥२८०॥ तब सुमन्त्र नाम के मन्त्री ने राजा को धीरज बँधाते हुए कहा-'महाराज आप क्या नहीं जानते स्वयं ही विचार कीजिए ॥२८१॥ जो सहस्रविद्याधर को छोड़कर तुम्हें देखते ही तुम्हारे साथ भाग आई, वह भला आपके साथ स्थिर होकर कैसे रह सकती है ? अच्छी और उत्तम वस्तु से निस्पृह यह स्त्री किसी क्षुद्र पुरुष के साथ वैसे ही चली गई, जैसे बांस की सलाई बांस की ओर ही जाती है।।।२८२-२८३।। उसे अवश्य ही नाट्याचार्य भगा ले गया है क्योंकि वह यहाँ नहीं है। वे दोनों नाट्यशाला में प्रातःकाल उपस्थित थे ऐसा सुना गया है ॥२८४॥ अतः हे स्वामिन् इस प्रकार उसकी चंचलता को जानते हुए भी तुम्हें उसके प्रति इतना आग्रह क्यों है ? क्योंकि विलासिनी स्त्री सन्ध्या के समान क्षण-भर के लिए ही अनुरागिनी होती है ॥२८५॥ मन्त्री द्वारा इस प्रकार कहा गया राजा हरिवर, विचार में पड़ गया और सोचने लगा कि इस बुद्धिमान् मन्त्री ने ठीक ही कहा है ॥२८६॥ विलासिनी स्त्री संसार की स्थिति के समान अन्त में नीरस दुःखदायिनी प्रत्येक क्षण में बदलनेवाली और अनित्य सम्बन्धवाली होती है ॥२८७॥ ६६