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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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नवम लम्बक ५२३ गिरे हुए को डुबाती हुई और उत्कण्ठा को बढ़ाती हुई अथाह नदियों और स्त्रियों के चक्कर में बुद्धिमान् फँस जाते हैं और उनमें डूब जाते हैं॥२८८॥ जो विपत्ति में व्याकुल नहीं होते सम्पत्ति में घमण्ड नहीं करते और कार्य के समय भागते नहीं वे ही धीर पुरुष हैं। उन्होंने संसार को जीत लिया है॥२८९॥ राजा हरिवर ने ऐसा सोचकर और मन्त्री के कथन से शोच को त्याग कर अपनी अन्य स्त्रियों से ही सन्तोष किया ॥२९०॥ वह अनंगप्रभा भी उस वियोगपुर नगर में नाट्यवाचार्य के साथ कुछ समय तक रही॥२९१॥ उस नगर में दैवयोग से उस नाट्यवाचार्य की एक युवा जुआरी सुदर्शन से मित्रता हो गई ॥२९२॥ उस जुआरी सुदर्शन ने शीघ्र ही नाट्यवाचार्य का समस्त धन नष्ट कराकर उसे अनंगप्रभा के सामने दरिद्र बना दिया ॥२९३॥ इस क्षोभ से अनंगप्रभा ने उस दरिद्र नाट्यवाचार्य को त्याग कर सुदर्शन को ही अपना पति बना लिया ॥२९४॥ स्त्री और धन के नाश से निराश होकर नाट्यवाचार्य वैराग्य के कारण तपस्या करने के लिए जग छोड़कर गंगा के तट पर जा बैठा ॥२९५॥ नये-नये पुरुषों को चाहनेवाली वह अनंगप्रभा अब उस जुआरी सुदर्शन के साथ रहने लगी ॥२९६॥ एक बार रात्रि के समय चोरों ने उसके घर में घुसकर अनंगप्रभा के नये पति जुआरी सुदर्शन का सर्वस्व चुराकर उसे कंगाल बना दिया ॥२९७॥ उस धन के अपहरण से दुःख में डूबी हुई और पश्चात्ताप करती हुई अनंगप्रभा को देखकर सुदर्शन ने उससे कहा—॥२९८॥ 'हिरण्यगुप्त नाम का एक धनवान् मेरा मित्र है। चलो उससे कुछ धन उधार लें' ॥२९९॥ भाग्य से नष्टबुद्धि सुदर्शन ऐसा कहकर उसके साथ हिरण्यगुप्त के समीप गया और उससे कुछ धन माँगा ॥३००॥ वह बनिया और वह अनंगप्रभा दोनों परस्पर आँखें मिलने पर एक दूसरे के प्रति आसक्त हो गये ॥३०१॥ तब उस वैश्य ने सुदर्शन से आदर के साथ कहा—'प्रातःकाल तुम दोनों को धन दूँगा। आज यहीं रहो और यहाँ भोजन करो' ॥३०२॥

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