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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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नवम लम्बक ५१७

यह सुनकर राजा भी चौंक कर जाग पड़ा और स्वप्न देखती हुई रानी भी जाग उठी। तब दोनों आश्चर्य-चकित होकर परस्पर स्वप्न-समाचार कहने लगे ॥१३१॥ तब प्रसन्न अनंगप्रभा राजा से कहने लगी-महाराज, मैंने अभी अपना सम्पूर्ण जाति- स्मरण कर ली। मैं विद्याधरों के राजा गयर की कन्या हूँ। वीरपुर नाम के नगर में अनंगप्रभा नाम से मैं उत्पन्न हुई। पिता के शाप से मर्त्यलोक में आकर और मानुषी बनकर मैं अपने विद्याधरी भाव को भूल गई। अब मैं जान गई हूँ। जबतक वह ऐसा कह ही रही थी कि इतने में उसका पिता गयर विद्याधर आकाश से उतरा ॥१३२-१३५॥ राजा सागरवर्मा ने उसे नमस्कार किया और वह गयर पैरों पर पड़ी हुई पुत्री अनंग- प्रभा से कहने लगा-॥१३६॥ आजा बेटी, अपनी इन विद्याओं का स्मरण करो। तुम्हारा शाप नष्ट हो गया। तूने एक ही जन्म में आठ जन्मों का दुःख भोग लिया ॥१३७॥ इस प्रकार कहकर और उन आठों में उपकार गयर ने अपनी विद्याएँ प्रदान कीं। तब गयर ने राजा सागरवर्मा से कहा-'भूप, मदनवेग नाम का विद्याधर राजा है। मैं गयर नाम का विद्याधर राजा हूँ और यह अनंगप्रभा मेरी कन्या है ॥१३८-१३९॥ वर के इस दिन इसने विवाह के लिए माँगा या उत्सव से इस कन्यिशा ने किसी एक को भी नहीं चाहा ॥१४०॥ उसी समय इसने मद्यपान दूषितों के मुख से भी सुन ली थी। ईर्ष्यावश से उस समय इसने मुझे भी स्वीकार नहीं किया ॥१४१॥ तब मैंने इसे कटुतापूर्वक से शाप का दण्ड दिया। कर्मयोग के परिणाम इसी मुखे यह दशा सुनी इसे इस प्रकार का स्वरूप याद कराती शिव की आराधना की और द्वारा द्वारा अपने विद्याधर-शरीर को पा लिया ॥१४२-१४३॥ वह प्रसन्न हुआ और इस भाँति मेरी कन्या अपने पूर्ण स्वरूप को प्राप्त कर निष्कण्टक रूप विद्याधराधिपति बनी। महासुख इस प्रकार बहु वर वरदानों से अपने पूर्वजन्म का स्मरण कर सुखपूर्वक गयर के आदेश से उसने उस कन्या का वरण किया और वह उसका आदरपूर्वक बन गया ॥१४४॥ ३८