कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextसप्तम लम्बक ३९ यह धीमवती की बहन है—यह देखते हुए मैं यह भूल गया कि हलाहल विष भी अमृत का सहोदर ही है॥९५॥ यह भी ठीक है कि दैव की आश्चर्यजनक चेष्टा को कौन व्यक्ति पुरुषार्थ से जीत सकता है॥९६॥ ऐसा सोचकर राजा ने क्रोध नहीं किया और वृत्तान्त पूछकर उस वैश्य-पुत्र को छोड़ दिया ॥९७॥ छूटा हुआ वैश्य-पुत्र अपने जाने का मार्ग खोजता हुआ भवन से निकलकर समुद्र के तट पर गया और उसने दूर से आते हुए एक जहाज को देखा ॥९८॥ तब उसी तख्ते पर चढ़कर, जिससे पहले आया था समुद्र में कूद पड़ा और चिल्लाकर रोने लगा कि मुझे बचाओ। उसका रोना-चिल्लाना सुनकर उस जहाज में बैठ हुए उसके स्वामी क्रोशवर्मा ने उसे जहाज में चढ़ाकर अपने पास रख लिया ॥९९ १ ॥ दैव ने जिसके नाश के लिए जो विधान रच रखा है, वह, दौड़कर भागते हुए का भी पीछा करता है॥१ १॥ यही कारण था कि वह मूर्ख बनिया जहाज में चलते हुए एकान्त में क्रोशवर्मा की स्त्री के साथ पकड़ा गया। क्रोशवर्मा उसके इस कुकृत्य को देखकर क्रुद्ध हो उठा और उसे समुद्र में फेंक दिया जिससे वह डूबकर मर गया ॥१ २॥ इधर राजा रत्नाधिपति क्रोध न करके राजन्ता (अपनी स्त्री) को सेवकों और सामान के साथ श्वेतरश्मि हाथी पर बैठाकर रत्नकूट ले आया ॥१ ३॥ रत्नकूट में पहुँचकर राजा ने उसे उसकी बहन धीमवती को सौंप दिया और धीमवती तथा मन्त्रियों को उसका सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥१ ४॥ और बोला—'आश्चर्य है कि सार रहित और नीरस सांसारिक भोगों में आसक्त रहकर मैंने कितना कष्ट पाया ॥१ ५॥ इसलिए, अब वन में जाकर भगवान् की शरण लेता हूँ जिससे फिर ऐसे कष्ट का भोग न करूँ॥१ ६॥ ऐसा कहते हुए, राजा दुःखी मन्त्रियों और धीमवती द्वारा बहुत रोके जाने पर भी वैराग्य पर दृढ़ रहा ॥१ ७॥ और उसने अपना सारा राज्य पापभंजन नामक एक श्रेष्ठ ब्राह्मण को विधिपूर्वक दान कर दिया और शेष धन धीमवती तथा अन्यान्य ब्राह्मणों को देकर माया से सर्वथा विरक्त हो गया ॥१ ८ १ ९॥