कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextनवम लम्बक ५६५ उठ हे वरदायिनी मुझ पर कृपा करो और मेरे शरीर से अपनी पूजा स्वीकार करो। मेरे स्वामी राजा विक्रमतुंग का कल्याण हो ॥१७५॥ ऐसा कहकर वह अपना गला काटने के लिए जैसे ही तैयार हुआ वैसे ही आकाशवाणी हुई—॥१७६॥ 'बेटा ऐसा साहस न करो। तेरी इस वीरता से मैं बहुत प्रसन्न हूँ इसलिए तुम अपना मनमाना वर माँगो' ॥१७७॥ यह सुनकर वह वीरवर बोला—'हे देवि ! यदि तू सन्तुष्ट है तो राजा विक्रमतुंग सौ वर्ष और जिये और मेरी पत्नी तथा बच्चे फिर से जीवित हो जायें ॥१७८॥ ऐसा वर माँगने पर 'ऐसा ही होगा'—इस प्रकार की दिव्यवाणी फिर हुई ॥१७९॥ और, उसी क्षण सम्पूर्ण शरीर के साथ धर्मवती सत्त्ववर और वीरवती तीनों जी उठे ॥१८ ॥ तब प्रसन्नचित्त वीरवर उन सब को घर पहुँचाकर फिर राजद्वार पर उपस्थित हो गया ॥१८१॥ इन सब दृश्यों को देखकर हर्षित और चकित राजा विक्रमतुंग फिर अपने महल में छिपे छिपे ही आ चढ़ा ॥१८२॥ और, 'सिंहद्वार पर कौन है' इस प्रकार ऊपर से ही बोला। यह सुनकर नीचे खड़े वीरवर ने उससे कहा—॥१८३॥ 'मैं यहाँ हूँ उस स्त्री को देखने के लिए मैं गया था। किन्तु, वह देखते-ही-देखते अन्तर्धान होकर कहीं चली गई ॥१८४॥ इस सारे आश्चर्यकारी वृत्तान्त को सुनकर राजा विक्रमतुंग एकान्त रात्रि में सोचने लगा—॥१८५॥ 'ओह ! यह वीरवर कोई असाधारण और अपूर्व पुरुष है। ऐसा प्रशंसनीय काम करके भी उसकी चर्चा तक नहीं करता ॥१८६॥ गम्भीर, विशाल और महासत्त्वशाली समुद्र भी प्रलयकालीन तूफान से क्षुब्ध हो उठता है किन्तु इससे समुद्र की बराबरी नहीं कर सकता क्योंकि यह उससे भी अधिक गम्भीर है ॥१८७॥ मेरे अनजाने रात्रि में मेरे लिए इसने पुत्र पुत्री स्त्री और अपने भी प्राण दे दिये अब मैं इसका बदला कैसे दे सकता हूँ ॥१८८॥ इस प्रकार की अनेक बातों को सोचता हुआ राजा राज भवन में उतरा और अपने शयनागार में आश्चर्यचकित होकर रात्रि व्यतीत की ॥१८९॥