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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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मत्स्य सम्भव ५७१ हे प्रभो यह समस्त प्राणियों का समूह और तेज का पुञ्ज तुममें वैसे ही उत्पन्न होता है जैसे जलती हुई अग्नि से चिनगारियां ॥३४॥ यह सारा भूत-संघात (प्राणि समूह) प्रलयकाल में तुम्हारे ही अन्दर उसी प्रकार समा जाता है जैसे सायंकाल के समय पक्षियों का समूह महावृक्ष में समा जाता है ॥३५॥ अखण्ड बेला से क्षुब्ध होकर समुद्र जैसे तरंग उत्पन्न करता है वैसे तुम भी अपने अंग से इन्द्र आदि लोकपालों को उत्पन्न करते हो ॥३६॥ तुम विरञ्चर होकर भी अ-रजा (रजहीन) हो। विश्वकर्मा होकर भी अ-क्रिय (कर्म रहित) हो। विश्व के आधार होकर भी स्वयं निराधार (आधार रहित) हो। वह कौन है जो तुम्हारी अलक्षितता का ज्ञान रखता है ॥३७॥ तुम्हारी कृपा दृष्टि से ही देव गण देवता उस महान् ऐश्वर्यों को प्राप्त करते हैं। अतः मुझ पर कृपा करो। शरण में आये हुए मुझे सदय दृष्टि से देखो ॥३८॥ इस प्रकार, स्तुति किये गये मत्स्यावतार को प्रसन्न दृष्टि से देखकर हरि ने नारद से कहा-जाओ क्षीरसमुद्र में उत्पन्न हुई अप्सराओं को मैंने इन्द्र के पास अपनी धरोहर के रूप में रखा था उन सबको रथ में बैठाकर शुभ शीघ्र मेरे कहने से यहाँ ले आओ ॥३९-४१॥ विष्णु के इस प्रकार कहने पर नारद मुनि ने 'जो आज्ञा' कहकर तुरन्त ही मातलि के साथ रथ में बैठी अप्सराओं को लाकर उपस्थित किया ॥४२॥ नारद द्वारा अप्सराओं के लाने पर उन अप्सराओं के रूप को भगवान् ने आदेश दिया-हे मत्स्यावतार ! दिव्यवर राजाओं व हरदेव व चक्रवर्ती ! त्वा मैंने ये अप्सराएँ दे दीं। तू इनका योग्य पति है और ये तेरी योग्य पत्नियां। क्योंकि शिव ने पहले ही इस वरदान का अवतार बताया है ॥४३-४५॥ यह सुनकर मत्स्यरूपधारी प्रसन्न होकर व रूप-लावण्य गुण से युक्त वे भगवान् के चरणों में गिरने पर हरि ने मातलि को आज्ञा दी कि इन सब रत्नरूप व अप्सराओं सहित जिस कार्य में यह आये थे, वहाँ को चले जाओ ॥४६-४७॥ भगवान् के ऐसा आदेश देने पर मत्स्यरूपधारी अप्सराओं के साथ हँसते-हँसते जलचरों द्वारा रक्षक हुए ॥४८॥