कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextअष्टम लम्बक ५८१ इसलिए तुम जाओ। अपनी भूमि से प्राप्त धन का अपने इच्छानुसार उपभोग करो, वत्सराज द्वारा इस प्रकार कहा गया वह वैश्य हर्ष से भरकर महाराज वत्सराज के चरणों में गिर पड़ा और सब ढोल-नगाड़े बजाता हुआ अपने परिजनों के साथ अपने घर जा रहा ॥१९३-९४॥ हरिशिख के ऐसा कहने पर और पिता की धार्मिकता सुनकर चकित नरवाहनदत्त अपने मन्त्रियों से बोला—॥९५॥ दैव मनुष्यों का धन छीनकर, पुनः तुरन्त ही क्यों दे देता है? इस प्रकार दैव मनुष्यों के उत्थान और पतन से खेल करता है, यह आश्चर्य है! ॥९६॥ यह सुनकर गोमुख ने कहा—'दैव की गति ऐसी ही है। इस सम्बन्ध में समुद्र शूर की कथा सुनो ॥९७॥ समुद्रशूर वैश्य की कथा पूर्व समय में राजा हर्षवर्मा का हर्षपुर नाम का विशाल नगर था, जिसमें सुराज्य के कारण प्रजा अत्यन्त प्रसन्न थी ॥९८॥ उस नगर में समुद्रशूर नाम का एक बनिया था। वह कुलीन, धार्मिक, धैवशाली और बहुत धनवाला था॥९९॥ एक बार समुद्रशूर व्यापार के लिए स्वर्णद्वीप को जाते हुए माल-सामान लेकर और समुद्र के तट पर पहुँचकर नाव पर चढ़ा ॥१००॥ उस नाव से समुद्र में जाते हुए कुछ ही मार्ग शेष रहने पर भीषण वात्य चक्र आकाश में उठा और समुद्र को क्षुब्ध कर देनेवाला भारी तूफान भी आ गया ॥१०१॥ ऊँची-ऊँची लहरों द्वारा नाव के फेंक दिये जाने और अन्ततः उसके डूब जाने के कारण वह बनिया कमर कसकर समुद्र में कूद पड़ा ॥१०२॥ तैरने पर कुछ समय तक वह हाथों को चलाकर समुद्र में तैरता रहा। तब उस समुद्र में गिरते हुए एक मुर्दे का शव उसके हाथ लग गया। वह वैश्य उस पर चढ़कर हाथों से पानी को चलाता हुआ वायु के अनुकूल होने के कारण सुवर्णद्वीप के तट पर पहुँच गया ॥१०३-१०४॥ वहाँ पहुँचकर वह उस शव से उतर पड़ा और उसकी कमर में बँधी हुई धोती को वह टटोलने लगा जिसमें एक गाँठ बँधी थी। उसने जब उसकी कमर से धोती निकालकर उसे खोलकर सम्भालकर देखा तो उस गाँठ में एक दिव्य और रत्नमय कण्ठाभरण उसे दिखाई पड़ा ॥१०५-१०६॥ उस अमूल्य कण्ठाभरण को देखकर वह प्रसन्न हुआ और भली भाँति स्नान करके उस शव द्वारा बचाये उसने समुद्र में डूबी हुई अपनी सम्पत्ति का दुःख भूल गया ॥१०७॥