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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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नवम लम्बक ५९५ इतने में ही भोगवर्मा का डण्डामरण नाम का एक मित्र आकर शीघ्रता से उससे बोला— हृद्यान्न भोजन तैयार है उठो आओ। घर में और भी अनेक मित्र तुम्हारी प्रतीक्षा में बैठे हैं ।।१९२-१९४।। 'मैं आज नहीं आऊँगा क्योंकि मेरा यह मित्र पाहुना बैठा है। ऐसा कहते हुए भोगवर्मा से उसके मित्र ने कहा—‘तुम्हारे साथ तुम्हारा पाहुना भी आवे। क्या यह हमारा मित्र नहीं है ? अतः शीघ्र उठो ।।१९५ १९६।। वह मित्र इस प्रकार भोगवर्मा को आग्रह के साथ ले गया और उसने यशोवर्मा के साथ जाकर उत्तम भोजन किया ।।१९७।। तदनन्तर, उधर से ताम्बूल आदि पान करके सायंकाल भोगवर्मा अपने घर आया। घर आकर यशोवर्मा के साथ सायंकालीन भोजन किया ।।१९८।। रात होने पर उसने अपने सेवकों से पूछा कि 'आज रात्रि के लिए पूरा जल है या नहीं। 'हाँ प्रभु है'—सेवकों के इस प्रकार कहने पर वह वैश्य भोगवर्मा चारपाई पर यह कहते हुए सो गया कि देख आज पिछली रात में कैसा पानी मिलता है' ।।१९९-२००।। उसी के समीप सोये हुए यशोवर्मा ने स्वप्न में देखा कि दो-तीन पुरुष शयनागार में प्रविष्ट हुए और उन के पीछे 'हे दुष्टो आज तुम लोगों ने भोगवर्मा के लिए पिछली रात में पीने के जल का ध्यान क्यों नहीं रखा' इस प्रकार कहते हुए बहुत से दंडधारी पुरुष घुसे और उन्होंने क्रोध करके डंडों से उन सेवकों को मारा ।।२०१—२०३।। 'यह हमारा पहला अपराध है क्षमा करो'—ऐसा कहते हुए उन सेवकों को छोड़कर वे चले गये ।।२०४।। तदनन्तर, यह देखकर और जागकर यशोवर्मा ने सोचा कि बिना चिन्ता किये ही आनेवाली भोगवर्मा की भोगश्री प्रशंसनीय है ।।२०५।। अर्थ से पूर्ण होने पर भी भोग-रहित कर्मवर्मा की अर्थलक्ष्मी ठीक नहीं ऐसा सोचते-सोचते उसकी वह रात्रि व्यतीत हो गई ।।२०६।। प्रातःकाल ही यशोवर्मा वैश्य भोगवर्मा से आज्ञा लेकर वहाँ से फिर विन्ध्यवासिनी के चरणों में गया ।।२०७।।