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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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[header] नवम लम्बक ५९७ [/header] वहाँ तपस्या में बैठे हुए यशोवर्मा ने स्वप्न में आई हुई विन्ध्यवासिनी से भोग-श्री की प्राप्ति के लिए वर माँगा और उसने वही दिया ॥२८८॥ तदनन्तर, यशोवर्मा देवी की कृपा से घर में जाकर बिना मोक्ष ही प्राप्त होनेवाली भोग-श्री से सुखपूर्वक रहने लगा ॥२८९॥ इस प्रकार, भोग से सम्पन्न थोड़ी भी श्री अच्छी है और भोगरहित अनन्त ऋद्धि भी व्यर्थ है ॥२९०॥ इसलिए, तुम लोग राजा समरबल की कृपणता से युक्त लक्ष्मी से क्यों ईर्ष्या करते हो? दान और भोग में लगती हुई अपनी सम्पत्ति को ही क्यों नहीं देखते? ॥२९१॥ इसलिए, उसके प्रति तुम्हारा आक्रमण ठीक नहीं। यात्रा का लग्न भी ठीक नहीं है और तुम्हारी विजय भी नहीं दीखती ॥२९२॥ उस ज्योतिषी से इस प्रकार कहे जाने पर भी वे पाँचों ईर्ष्यालु राजाओं ने नहीं माना और उन्होंने समरबल पर चढ़ाई कर दी ॥२९३॥ शत्रुओं को सीमा पर गये हुए जानकर युद्ध के लिए निकलते हुए समरबल ने स्नान करके शिव की पूजा की ॥२९४॥ अनन्तर उसने स्वाता के प्रसिद्ध मार्ग से उसने विधिपूर्वक पापहरूप करनेवाले शिव की स्तुति की ॥२९५॥ तब उसने 'हे राजन् बिना शंका के जाकर युद्ध करो शत्रुओं पर अवश्य विजयी होगे'— 'इस प्रकार आकाशवाणी सुनी ॥२९६॥ तब प्रसन्न होकर और अपनी सेना का साथ लेकर राजा समरबल उन शत्रुओं के साथ भिड़ा ॥२९७॥ उसके शत्रुओं की सेना में तीन हजार हाथी तीन लाख घोड़े और एक करोड़ पैदल सैनिक थे ॥२९८॥ उसकी अपनी सेना में बीस लाख पैदल सैनिक दस हजार हाथी और एक लाख घोड़े थे ॥२९९॥ दोनों सेनाओं में घमासान युद्ध प्रारम्भ होने पर राजा का वीर नाम का अंगरक्षक आगे बढ़ा। तदनन्तर राजा समरबल भी समुद्र में महावराह के समान स्वयं भी उस सेना में धँस पड़ा ॥३००-३०१॥ थोड़ी सेनावाला होने पर भी समरबल ने शत्रुओं की सेना का खूब संहार किया जिससे हाथियों, घोड़ों और सैनिकों की लाशों के ढेर लग गये ॥३०२॥