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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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नवम लम्बक ६१३ ... रहूरहा गया है। उस राजकुमारी के घर होना न आपका ही लिखाया था ॥३६॥ उस में बार-बार नहीं लिख सकता इसलिये आपके सम्मुख आने पर भी निष्कपट वा आपके साथ छल नहीं किया जा सकता ॥३७॥ इस प्रकार कहते हुए तैलङ्ग से राजा ने कहा—'चित्रपट पर लिखी गई उस मुझे सुता दे डाला। तब चित्रकार ने आले(अङ्गूसा) से उस चित्र पट को सादर निकाला और मदनसुन्दरी का वह रूप राजा को दिखा दिया ॥३८-३९॥ राजा कनकवर्ष चित्र में लिखी रहने पर भी विचित्र लावण्यमयी उसे देखकर उसी क्षण काम के वशीभूत हो गया ॥४०॥ तब राजा ने उस चित्रकार का प्रचुर सुवर्ण-मुद्राओं से सम्मानित करके तुरन्त अपनी चित्रशाला का चित्र लाने का अपने विश्वस्त दूत को भेजा गया ॥४१॥ वह चित्रकार उस उत्सव और लावण्य का नेता तैलङ्गप्रभृत सेवावाला वह राजा राज्य व रानी के साथ हाथ जोड़कर चित्रपट पुत्री के सम्मुख होकर प्रणाम करने लगा ॥४२॥ उसी समय अवसर पाकर रूप का अपने को ईर्ष्या करनेवाला कामदेव ने भी बाणों का मार से राजा को अधीर बना दिया ॥४३॥ उस राजा ने अपने रूप पर आत्मश्लाघा का नैया। राजनीतिज्ञ उसका राज्य न देख परिणाम शून्य का भय स्थिर रहा था ॥४४॥ इस प्रकार कुछ ही दिनों में राजा विरह से दुर्बल होकर पीला पड़ गया और दुबला हो गया। यह देखकर मन्त्री ने गुप्त मन्त्रणा का निश्चय रूप शान्ति किया और चित्रकार को वहां से उसने अपने गृह पर का प्रस्थान कर दी ॥४५॥ या इस भांति न सम्मर्जित करके मदनमञ्जरी के पिता का पार्वणार्थिक विना राज्य दे देने पर के दाता रूप में उसका निष्कास दिया गया ॥४६॥ दृष्टान्त से डर कर राजा को एक दूत विशेष दूत रूप कनकप्रभा आवश्यक रूप में देकर मदनमञ्जरी के पास देने के लिए भिजवाया ॥४७॥ ... ...