BharatKosha
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

Page 678 of 1079

Read in context
Page 678

नवम लम्बक ६३१

उसी क्षण आकाश से आते हुए किसी विद्याधर ने वेग से नीचे उतरकर तलवार के एक ही प्रहार से उस सिंह के दो टुकड़े कर दिये ॥२ ४॥

और पास में आकर उस आकाशचारी ने राजा से पूछा—'हे राजा कनकवर्ष तुम इस स्थिति में क्यों पहुँच गये हो ? ॥२ ५॥

यह सुनकर और अपनी स्थिति का स्मरण करके राजा ने उससे कहा—'विषाद की अग्नि से पायस बने हुए मुझे क्या तुम नहीं जानते? ॥२०६॥

तब विद्याधर ने कहा—'मैं पहले बन्धुमित्र नामक मनुष्य परिव्राजक होकर तुम्हारे नगर में रहता था। सेवा से प्रार्थना करने पर तुम्हारी सहायता से वीर बेताल की सिद्धि द्वारा विद्याधर पद को प्राप्त हुआ हूँ ॥२ ७-२ ८॥

इसी कारण तुम्हें पहचानकर तुम्हारा प्रत्युपकार करने के लिए, तुम्हें मारने के लिए उद्यत इस सिंह को मैंने मार डाला ॥२ ९॥

अब मैं आज नाम से बन्धुप्रभ हो गया। इस प्रकार कहकर उस पर प्रेम प्रकट करते हुए राजा कनकवर्ष ने कहा—'हाँ हाँ मुझे स्मरण है। आज तुमने मित्रता निभा दी। अब यह बताओ कि पत्नी और पुत्र से मेरा मिलन कब होगा ? ॥२१०-२११॥

राजा की यह बात सुनकर और अपनी विद्या के प्रभाव से सब बात जानकर बन्धुप्रभ नामक विद्याधर ने राजा से कहा—'विन्ध्यवासिनी का दर्शन प्राप्त करने पर पत्नी और पुत्र का मिलन तुम्हें हो जायगा। अतः तू अपनी कार्य-सिद्धि के लिए जा। मैं अपने विद्याधर-लोक को जाता हूँ ॥२१२-२१४॥

इस प्रकार कहकर उस विद्याधर के आकाश में उड़ जाने पर धीरे-धीरे धैर्य धारण किया हुआ वह राजा कनकवर्ष विन्ध्यवासिनी के दर्शन को गया ॥२१४॥

वन-मार्ग में जाते हुए राजा पर मस्तक और सूँड को हिलाता हुआ एक बड़े जंगली हाथी ने आक्रमण कर दिया ॥२१५॥

उसे देखकर राजा ने एक खड्ड के मार्ग से दौड़ना आरम्भ किया इस प्रकार राजा के पीछे दौड़ता हुआ वह हाथी उस खड्ड में गिरकर मर गया ॥२१६॥

तब मार्ग की थकावट से व्याकुल और प्यासे राजा को मार्ग में ऊँचे-ऊँचे और निविड़ कमलों- वाला एक तालाब मिला। उसमें स्नान करके जल पीकर और कमल-नालों को खाकर तृप्त राजा सरोवर के पास एक वृक्ष के नीचे विश्राम करते-करते सो गया ॥२१७-२१८॥