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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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सप्तम लम्बक ४९ और पेड़ के समान कन्धे से निकले हुए उसके पाणि-पल्लव का स्मरण करते हुए सोचने लगा 'कि मैंने उसका हाथ पकड़ने पर भी विवाह नहीं किया यह बहुत बुरा किया' ॥३१॥ अतः अब मैं पुष्करावती पुरी में उसी के समीप जाता हूँ। या तो प्राणों का त्याग करूँगा अथवा दैव ही मेरी सहायता करेगा ॥३२॥ ऐसा सोचते हुए उस काम-पीड़ित वैश्य ने उस दिन को किसी प्रकार व्यतीत किया और प्रातःकाल उठते ही उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा ॥३३॥ उस ओर जाते हुए उसे मार्ग में और भी तीन बनिया सहयात्री मिले, जो उत्तरापथ की ओर जा रहे थे ॥३४॥ उनके साथ नगरों ग्रामों जंगलों और नदियों को पार करके वह म्लेच्छों से भरी हुई उत्तर दिशा में पहुँचा ॥३५॥ वहाँ पर वह उन अन्य यात्रियों के साथ ताजिक (म्लेच्छ) लोगों से पकड़ा जाकर दूसरे ताजिक के हाथ दामा पर बेच दिया गया ॥३६॥ उसने भी उन चारों को खरीद कर नौकर के हाथों उपहार-स्वरूप मुरवार नामक तुर्क के पास भिजवा दिया ॥३७॥ जब उस ताजिक के नौकर, उन तीनों के साथ निश्चयदत्त को लेकर मुरवार के पास पहुँचे तब वह (मुरवार) मर चुका था। अतः उन्हें उसके पुत्र को सौंप दिया गया ॥३८॥ 'यह मेरे मित्र ने पिता के लिए उपहार भेजा है अतः इन्हें कल प्रातः उन्हीं के पास कब्र में गाड़ दिया जायेगा'—ऐसा कहकर उस तुर्क के पुत्र ने उन्हें कसकर बाँधा और एक तरफ रख दिया ॥३९-४०॥ तदनन्तर जकड़कर बाँधे गये उन अन्य तीन वैश्य-पुत्रों का मृत्यु के भय से व्याकुल देखकर निश्चयदत्त ने उनसे कहा—॥४१॥ 'शोक और दुःख मनाने से तुम्हारा क्या बनेगा। धीरज धरकर पड़े रहो। धैर्यशाली लोगों की विपत्तियाँ माता डरकर दूर भागती हैं ॥४२॥ उस एकमात्र संकट को दूर करनेवाली जगदम्बा भगवती का स्मरण करो। इस प्रकार साथियों का धीरज बँधाकर निश्चयदत्त भगवती की स्तुति करने लगा—॥४३॥ हे महादेवि ! तुम्हारे उन चरणों में प्रणाम करता हूँ जिनमें मारे हुए असुरों का रक्त अलता (महावर) के समान शोभित होता है ॥४४॥ विश्व का ऐश्वर्य प्रदान करनेवाली तुमने शिव को भी जीत लिया। ये तीनों लोक तुम्हारी ही जीवित या सक्रिय प्रेरणा हैं ॥४५॥ ७