कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
Page 720 of 1079
Read in contextनवम लम्बक १७४ तदनन्तर, अपने भाई के द्वारा एक-एक करके परिचित कराये जाते हुए अनेक राजाओं को छोड़ती हुई दमयन्ती क्रमशः नल के पास पहुँची ॥२७०॥ वहाँ जाकर छाया (परछाई) पलक गिरना आदि मानव गुणों से युक्त छह नलों को देखकर भाई के व्याकुल हो जाने पर दमयन्ती सोचने लगी-॥२७१॥ अवश्य ही उन पाँचों लोकपालों ने यह माया फैलाई है। इसलिए, इनमें छठे को ही मैं वास्तविक नल समझूँ और कोई दूसरा उपाय नहीं है ॥२७२॥ ऐसा सोचकर एकमात्र नल में लगे हुए मनवाली दमयन्ती सूर्य की ओर मुंह करके इस प्रकार बोली-॥२७३॥ 'हे लोकपालो यदि स्वप्न में भी मेरा मन नल को छोड़कर किसी दूसरे पुरुष में न गया हो तो इसी सत्य के प्रभाव से मुझे अपना स्वरूप दिखलाओ ॥२७४॥ विवाह से पहले ही वर लिये गये पुरुष के अतिरिक्त कन्या के लिए और सभी पर-पुरुष हैं और दूसरों के लिए, वह कन्या परस्त्री के समान है। तब तुम लोगों का यह कैसा अज्ञान है ॥२७५॥ यह सुनकर इन्द्र आदि पाँचों लोकपाल अपने वास्तविक रूप में आ गये और छठा राजा नल अपने यथार्थ रूप में स्पष्ट हुआ ॥२७६॥ तब प्रसन्न दमयन्ती ने खिले हुए नीलकमलों के समान अपनी दृष्टि और वरमाला दोनों ही राजा नल को डाल दिये ॥२७७॥ इतने में आकाश से पुष्पों की वर्षा हुई। तब राजा भीम ने दमयन्ती का नल के साथ विधिपूर्वक विवाह कर दिया ॥२७८॥ इसके बाद भीम के द्वारा उचित शिष्टाचार और सत्कार किये गये अन्यान्य राजा और इन्द्र आदि देवता भी अपने-अपने स्थानों को गये ॥२७९॥ इन्द्र आदि देवताओं ने जाते हुए मार्ग में द्वापर और कलियुग को देखा। उन दोनों को दमयन्ती के स्वयंवर के निमित्त आये हुए जानकर उनसे वे देवता बोले-॥२८०॥ 'अब तुमलोग विदर्भ की ओर न जाओ। हम लोग वहीं से आ रहे हैं। स्वयंवर हो गया और दमयन्ती ने राजा नल को वर लिया ॥२८१॥ यह सुनते ही वे दोनों भारी क्रोध से बोले-'आप लोगों के समान देवताओं को छोड़कर उसने मनुष्य का वरण किया इसलिए हम उन दोनों का वियोग अवश्य करायेंगे' इस प्रकार प्रतिज्ञा करके वे दोनों वहीं से लौट गए ॥२८२-२८३॥ उधर राजा नल सात दिनों तक ससुराल में रहकर नई वधू दमयन्ती के साथ निषध देश को आ गया ॥२८४॥ ८५