कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextनवम लम्बक १७७ तब दमयन्ती ने राज्य को चौपट हुआ समझकर दोनों बच्चों को उत्तम रथ में बैठाकर अपने पिता के घर भेज दिया ॥३ १॥ धीरे-धीरे, नल सारा राज्य हार गया। तब उससे जितन्द्रिय पुष्कर ने कहा-'तुम सब कुछ तो हार चुके हो अब उस बैल के दाँव पर दमयन्ती को लगाओ ॥३ १ २॥ उसकी इन बातों की आँधी से भाप की तरह जलता हुआ नल उस बुरे समय में भी उससे कुछ नहीं बोला और न दमयन्ती को ही दाँव पर लगाया ॥३ ३॥ तब उसके भाई पुष्कर ने कहा-यदि दाँव पर दमयन्ती को नहीं लगाते हो तो तुम उसके साथ ही मेरे देश से निकल जाओ' ॥३ ४॥ तब राजा नल दमयन्ती के साथ उस देश से निकल गया और राज्य के सिपाही उसे राज्य की सीमा तक छोड़ आये ॥३ ५॥ 'हाय ! जहाँ कलि ने नल की भी ऐसी दुर्दशा कर डाली वहाँ अन्यान्य कीड़ों के समान साधारण प्राणियों की कथा ही क्या है ॥३ ६॥ ऐसे धर्महीन और स्नेह-रहित जूए को बार-बार धिक्कार है, जो नल-जैसे राजर्षियों को भी विपत्ति में डाल देता है और जो कलि तथा द्वापर का जीवन है ॥३ ७॥ तदनन्तर, भाई द्वारा निर्जित विदेश को जाता हुआ भूख से व्याकुल वह नल एक वन के मध्य में एक तालाब पर पहुँचा ॥३ ८॥ वहाँ पर कुशों से कटे हुए कोमल पैरोंवाली दमयन्ती के साथ उस जंगली सरोवर के तट पर उस नल ने दो हंसों को देखा ॥३ ९॥ उनको पकड़ने के लिए उसने उन पर अपना दुपट्टा डाला परन्तु वे हंस उसे भी अपने साथ लेकर उड़ गए ॥३१०॥ तब नल ने आकाश से यह वाणी सुनी कि ये दोनों हंस जूए के दो पासे थे जो तेरा वस्त्र भी ले गये ॥३११॥ अब केवल एक वस्त्र (धोती) ही पहना हुआ नल कुञ्चित मन से बैठा हुआ दमयन्ती को उसके पिता के घर का मार्ग बताने लगा—॥३१२॥ 'हे प्रिये यह मार्ग विदर्भ की ओर तेरे पिता के घर को जाता है और यह कोशल देश की ओर ॥३१३॥ यह सुनकर दमयन्ती को यह शंका हुई कि क्या आर्यपुत्र मुझे मार्ग बताकर छोड़ना चाहते हैं ॥३१४॥