BharatKosha
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

Page 726 of 1079

Read in context
Page 726

प्रथम लम्बक १७३ तब वे दोनों पति-पत्नी सायंकाल में फल मूल जल आदि खा-पीकर कुश के आस्तरण पर शान्त होकर सो गये ॥३१५॥ मार्ग-श्रम से श्रान्त दमयन्ती धीरे-धीरे गहरी नींद में सो गई, किन्तु कलियुग से मोहित नल उसे छोड़कर भागने की चिन्ता में जागता ही रहा ॥३१६॥ तदनन्तर, उसे सोई हुई जानकर, एक वस्त्र पहने हुए दमयन्ती को छोड़कर, उसकी चादर के फटे हुए आधे टुकड़े को ओढ़कर वह नल वहाँ से चला गया ॥३१७॥ रात बीतने पर जागी हुई दमयन्ती ने वन में पति को न देखकर और उसे त्याग कर गया हुआ जानकर विलाप करना आरम्भ किया—॥३१८॥ 'हाय आर्यपुत्र ! हाय महासत्त्वशालिन् ! हाय शत्रुओं पर भी कृपा करनेवाले ! हाय मेरे प्यारे ! किसने तुझे मेरे प्रति इतना निर्दय बना दिया ? ॥३१९॥ तू अकेला इन घोर जंगलों में कैसे जायगा तेरी थकावट दूर करने के लिए कौन सेवा करेगा । राजाओं के सिर पर धारण की हुई मालाओं के पराग से जो तेरे चरण रंग जाते थे उन तेरे चरणों को अब मार्ग की धूल कलुषित करेगी ! ॥३२०-३२१॥ जो तेरा शरीर, चन्दन के लेप का भी सहन नहीं कर सकता था वह अब दोपहर के सूर्य की प्रचंड गरमी को कैसे सहन करेगा ॥३२२॥ मुझे शिशु बालक से क्या करना है, लड़की से क्या और अपनी आत्मा से भी क्या काम है ? यदि मैं सती हूँ तो उसके प्रभाव से देवता तेरा कल्याण करें ॥३२३॥ इस प्रकार, एक-एक बात के लिए नल की चिन्ता करती हुई वह सती दमयन्ती नल द्वारा पहले दिन दिखाये हुए मार्ग से आगे चल पड़ी ॥३२४॥ मार्ग में जाते हुए उसने नदियों पहाड़ों और जंगलों को किसी प्रकार पार किया किन्तु पति भक्ति को वह किसी प्रकार पार न कर सकी ॥३२५॥ मार्ग में उसके सतीत्व के तेज ने उसकी रक्षा की जिससे वह सर्प से बच गई और उस पर आसक्त व्याध (बहेलिया) भस्म होगया ॥३२६॥ तब दैवयोग से मार्ग में मिले हुए व्यापारियों के एक दल के साथ वह सुबाहु नाम के राजा के नगर में जा पहुँची ॥३२७॥ वहाँ पर राजकुमारी ने अपने महल से बैठे-बैठे दमयन्ती को दूर से ही देख लिया और उसकी सुन्दरता से प्रसन्न होकर उसे बुलवाकर और भेंट-रूप में उसे अपनी माता को सौंप दिया ॥३२८॥ तब वह दमयन्ती उस महारानी से समादृत होकर उसी के पास रहने लगी। समाचार पूछने पर उसने इतना ही कहा कि मेरा पति मुझ छोड़कर चला गया ॥३२९॥