कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextद्वादश लम्बक ७०१ 'शुभदत्त ! तुझे मालूम नहीं है। घड़े के अन्दर हाथ डालोगे तो जो चाहोगे इच्छा नुसार मिलेगा क्योंकि यह घड़ा इच्छित भाजन-वस्तु देनेवाला है ॥३३॥ यह सुनकर शुभदत्त ने जैसे ही घड़े के अन्दर हाथ डाला इच्छित अन्न पान आदि उसे प्राप्त हुए। उसे उसने उन चार यक्षस्वामियों को खिलाया और उसी से निकालकर स्वयं भी उसने खाया ॥३४-३५॥ इस प्रकार, भक्ति और भय से यक्षों की सेवा करता हुआ शुभदत्त केवल अपने कुटुम्ब के लिए ही चिन्तित रहता था ॥३६॥ उसके दुःखित परिवार को भी यक्षों ने स्वप्न में आदेश देकर निश्चिन्त कर दिया इसलिए शुभदत्त और भी मग्न रहने लगा ॥३७॥ एक मास के पश्चात् उन यक्षों ने उससे कहा-'हमलोग तेरी सेवा से सन्तुष्ट हैं बोल तुझ क्या दें' ॥३८॥ यह सुनकर वह यक्षों से बोला-'यदि आपलोग मुझसे प्रसन्न हैं तो मुझे आपलोग भद्र घट दे दें' ॥३९॥ तब उसे यक्षों ने कहा-'तू इसे रख न सकेगा क्योंकि टूट जाने पर यह भाग जाता है, इसलिए दूसरा वर माँग' ॥४०॥ यक्षों के इस प्रकार कहने पर भी जब शुभदत्त न नहीं माना तब उनलोगों ने उसे भद्र घट दे दिया ॥४१॥ तब वह प्रसन्न शुभदत्त उन लोगों को प्रणाम करके और घड़े को उठाकर मैत्री के साथ अपने घर आया और अपने कुटुम्ब को आश्वासित किया ॥४२॥ वहाँ घर पर निरन्तर वह उस घड़े से भोजन-सामग्री निकालकर दूसरों को खिलाता था और स्वयं अपने कुलस्त्रियों के साथ खाता था ॥४३॥ घास ढोने के भार से मुक्त और विविध प्रकार के भोगों को भोगता हुआ वह एक बार जब मदपान करके नशे में चूर हो रहा था तभी उसके बन्धुओं ने उससे पूछा कि सुख भोगने के लिए यह सामग्री कहाँ से मिली ? ॥४४॥ वह मुख में कुछ रख न सका और अभिमान के मारे न बच सका। फल देनेवाले उस घट को ही कन्धे पर लेकर नाचने लगा ॥४५॥ नशे में लड़खड़ाते और नाचते हुए उसके पैर फिसल जाने के कारण कन्धे से पृथ्वी पर गिर कर वह घड़ा टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गया ॥४६॥