कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
Page 752 of 1079
Read in contextदशम लम्बक ७५ ऐसा सोचकर वह रत्नवर्मा अपने पुत्र ईश्वरवर्मा को साथ लेकर यमजिह्वा नाम की कुट्टनी के पास गया ॥५९॥ वहाँ उसने मोटी ठुड्डीवाली लम्बे दाँतोवाली बीच में बैठी हुई (चिपटी) नाक- वाली कुट्टनी को अपनी पुत्री को इस प्रकार की शिक्षा देते हुए देखा ॥६०॥ 'बेटी धन से ही सबकी पूजा होती है। विशेष करके वेश्या-प्रेमी व्यक्ति धन नहीं रख सकता। अतः, वेश्या को प्रेम से दूर रहना चाहिए। राग (प्रेम) वेश्या और सायंकालीन सन्ध्या के लिए दोषों का अग्रदूत है इसलिए सुशिक्षिता वेश्या को नटी के समान कृत्रिम प्रेम प्रदर्शित करना चाहिए ॥६१-६२॥ पहले तो उसे अपने प्रति आसक्त व्यक्ति का मनोरंजन करना चाहिए, तब उसका रक्त और उसके बाद उसका धन दुहना चाहिए उसका धन दुह लेने पर उसे त्याग देना चाहिए और यदि उसे धन मिल जाय तो फिर उसे दुहना चाहिए ॥६३॥ जो वेश्या मुनियों के समान युवक में बालक में वृद्ध में कुरूप में और सुन्दर में समान भाव रखती है वह परम अर्थ (प्रचुर धन) प्राप्त करती है ॥६४॥ अपनी कन्या को इस प्रकार की शिक्षा देती हुई कुट्टनी के पास वह रत्नवर्मा गया और उसके स्वागत-सत्कार करने पर उसके पास जाकर बैठ गया ॥६५॥ और कहने लगा 'हे आर्ये मेरे इस पुत्र को वेश्याओं की कला सिखाओ। जिससे यह चतुर नागरिक बन सके। इसकी शिक्षा के मूल्य-रूप में एक सहस्र दीनार तुझे देता हूँ। यह सुनकर उसने वैश्य की बात स्वीकार कर ली ॥६६-६७॥ तदनन्तर, वह दीनार देकर और पुत्र ईश्वरवर्मा को उसे सौंपकर रत्नवर्मा अपने घर आ गया ॥६८॥ तत्पश्चात् ईश्वरवर्मा एक वर्ष तक यमजिह्वा के घर में रहकर शिक्षा ग्रहण करके सोलहवां वर्ष प्राप्त होने पर अपने पिता के घर लौट आया ॥६९॥ घर जाकर वह पिता से बोला 'धर्म और अर्थ'—ये दोनों पुरुषार्थ अर्थ से ही सिद्ध होते हैं। अर्थ की उपासना से बढ़कर दूसरी कोई उपासना नहीं है ॥७०॥ इस प्रकार कहते हुए पुत्र पर शिक्षित होने का विश्वास करके उसने उसे प्रसन्नतापूर्वक व्यापार के लिए पाँच करोड़ मुद्रा का कोष दिया ॥७१॥ उसे लेकर वह वैश्य का पुत्र व्यापारियों के दल के साथ शुभ दिन में स्वर्णद्वीप जाने की इच्छा से चला ॥७२॥ ८९