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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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दशम लम्बक ७७ जाते हुए मार्ग में वह क्रमशः कांचनपुर नगर में पहुँचा और वहाँ पहुँचकर उसने नगर के बाहर एक उद्यान में डेरा डाला ॥७३॥ स्ना-नीकर और इत्र आदि लगाकर वह कांचनपुर नगर में गया और वहाँ नाटक देखने के लिए एक देवमन्दिर में प्रविष्ट हुआ ॥७४॥ वहाँ उसने सुन्दरी नाम की एक नर्त्तकी (वेश्या) को देखा जो तरुणता के तूफान से उछलती हुई लावण्य-सागर के तरंग के समान लग रही थी ॥७५॥ दूर से ही उसे देखकर वह हृदय से उस पर इस प्रकार आसक्त हो गया कि यमजिह्वा कुट्टनी की सारी शिक्षा उससे दूर हो गई ॥७६॥ और, नृत्य के समाप्त होने पर उस वैश्य के पुत्र ने अपने एक मित्र द्वारा उससे मिलने की प्रार्थना की। उसने भी 'मैं धन्य हूँ' ऐसा कहकर उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली ॥७७॥ तब वह ईश्वरवर्मा अपने निवास-स्थान पर, चतुर और मितभाषी रक्षकों को नियुक्त करके उस वेश्या के निवासस्थान पर गया ॥७८॥ उसके वहाँ पहुँचते ही मकरकटी नाम की सुन्दरी वेश्या की माता उसके पास आई और उसने उस समय के योग्य उन-उन शिष्टाचारों से उसका स्वागत-सम्मान किया ॥७९॥ रात्रि के आगमन पर, लटकते हुए रत्नोंवाले चँदोवे से सजे हुए और सुन्दर बिछे हुए पलंगोंवाले शयनागार में उसका प्रवेश कराया ॥८०॥ उस शयनागार में वह ईश्वरवर्मा भिन्न-भिन्न प्रकार के आगतों, नृत्यों और सुरत-क्रीड़ाओं में विदिता एवं अत्यन्त अनुराग प्रदर्शित करती हुई उस सुन्दरी के साथ रमण करने लगा ॥८१॥ उससे गम्भीर प्रेम प्रकट करती हुई और पार्श्व से न हटती हुई उसे देखकर ईश्वरवर्मा दूसरे दिन भी उसके घर से न निकल सका और उस वेश्या को इन दो दिनों में उसने सोना, रत्न आदि पच्चीस लाख रुपया का सामान दिया ॥८२-८३॥ 'मैंने बहुत धन कमाया किन्तु आपके समान प्रेमी व्यक्ति न पाया। यदि प्रेमी ही आपके जैसा मिल गया तो इस धन से क्या करना ? ॥८४॥ इस प्रकार मिथ्या आग्रह से उस धन को नटती हुई सुन्दरी से उसकी माता मकरकटी ने कहा-'मेरी तो तू ही एक सन्तान है। अब तो जो भी मेरा धन है, वह सब इसी (ईश्वरवर्मा) का है। उसी में इसे भी सम्मिलित कर ला बेटी ! हानि क्या है?' ॥८५-८६॥ माता के इस प्रकार कहने पर सुन्दरी ने माना अत्यन्त वञ्चितता से उस धन को लिया। उसके इस प्रकार के कपट-वचनों से ईश्वरवर्मा ने उसे सच्चे प्रेमवाली समझ लिया ॥८७॥