कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
Page 76 of 1079
Read in contextसप्तम लम्बक ५५ हे महाभाग ! तुम मुझ दीन स्त्री को न मारो। इस समय में मैं तुम्हारी शरण में हूँ। और, मन्त्रपाठ बन्द कर यक्षिणी ने निश्चयदत्त से फिर इस प्रकार कहा—॥७५॥ मेरी रक्षा करो। मैं सब जानती हूँ। तुम्हारा अभिप्राय समझती हूँ। अनुरागपरा जहाँ रहती है, वहाँ तुम्हें पहुँचा देती हूँ ॥७६॥ इस प्रकार विश्वास के साथ कहने पर निश्चयदत्त ने मन्त्र-पाठ बन्द कर दिया ॥७७॥ तदनन्तर, उस यक्षिणी के कन्धे पर चढ़कर वह निश्चयदत्त प्रिया अनुरागपरा की ओर चला ॥७८॥ रात बीतने होने पर सबेरे एक पर्वतीय जंगल में पहुँचकर वह विनम्रा यक्षिणी निश्चयदत्त से बोली—'हे महाभाग ! अब सूर्योदय होने पर ऊपर जाने के लिए मेरी शक्ति नहीं है। इसलिए, तुम इसी रमणीय जंगल में दिन बिताओ। मीठे-मीठे फल खाओ। झरनों का सुन्दर-स्वच्छ जल पियो। मैं अपने घर को जाती हूँ। रात होने पर फिर आऊँगी ॥७९—८१॥ उसी समय तुम्हें हिमालय के शिखर की माला के समान पुष्करावती नगरी में अनुरागपरा के समीप पहुँचा दूँगी। ऐसा कहकर और निश्चयदत्त को कन्धे से उतारकर उसकी यात्रा फिर जाने के लिए सच्ची प्रतिज्ञा करके वह यक्षिणी चली गई ॥८२-८३॥ उसके चले जाने पर निश्चयदत्त ने वहाँ पर एक अथाह और अन्दर से विषैले एवं बाहर से स्वच्छ तालाब को देखा। 'स्त्रियों का चित्त इसी प्रकार भीतर से विषमय और बाहर से स्वच्छ दीखता है' सूर्य मानो अपनी करा (किरणों) से निश्चयदत्त को यह कहते हुए तालाब दिखा रहा था ॥८४-८५॥ प्यासा निश्चयदत्त मनुष्य के कृत्य से उस तालाब को जहरीला समझकर पानी के लिए उस दिव्य पर्वत पर इधर-उधर घूमने लगा ॥८६॥ घूमते हुए उसने पहाड़ की ऊँची भूमि में मिट्टी के अन्दर पद्मराग मणि के समान चमकती हुई दो आँखें देखीं। उसके बाद वह उस भूमि को खोदने लगा ॥८७॥ मिट्टी को हटाते ही उसने जीवित बन्दर का सिर देखा। जैसे ही वह उसके लिए सोचने लगा इतने में ही वह बन्दर मनुष्य की वाणी में बोला—॥८८-८९॥