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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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षष्ठम लम्बक ७५१ हे स्वामी इस प्रकार वीर, सदाचारी और सुन्दर पति के रहने पर भी विचारशील युवतियों का भी मन चंचल होकर यहाँ-वहाँ दौड़ता है। विशुद्ध मनवाली स्त्रियाँ विरल ही होती हैं ॥१४॥ मरुभूति द्वारा इस प्रकार कही गई कथा को सुनकर वत्सराज-पुत्र नरवाहनदत्त ने सुखपूर्वक सोकर रात बिताई ॥१४१॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट विरचित कथासरित्सागर के शक्तियश लम्बक का द्वितीय तरंग समाप्त

तृतीय तरंग नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत)

सुबह में सोकर उठने के बाद आवश्यक कर्मों से निवृत्त होकर नरवाहनदत्त अपने मन्त्रियों के साथ उद्यान में विहार करने के लिए गया ॥१॥ उद्यान में भ्रमण करते हुए उसने आकाश में पहले तेज का पुंज और उसके पश्चात् ही आकाश से उतरती हुई बहुत-सी विद्याधरियों को देखा ॥२॥ उन चमकती हुई विद्याधरियों के मध्य उसने एक कन्या को इस प्रकार देखा मानों तारिका-मंडल के मध्य चमकती हुई नयनहारिणी चन्द्रमा की रेखा हो ॥३॥ उसका मुख-कमल खिला हुआ था और उसके चंचल नयन भ्रमरों के समान घूम रहे थे। हंस के समान लीलायुक्त गमन करती हुई उसके शरीर से कमल के समान सुगन्धि निकल रही थी ॥४॥ तरंग युक्त त्रिवली-लता से उसकी कमर अलंकृत थी मानों काम-रूपी बावली की छाया की वह मूर्तिमती अधिदेवता थी ॥५॥ कामदेव की संजीवनी-विद्या के समान और उत्कंठित चन्द्रमा की मूर्ति के समान उसे देखकर समुद्र के समान वत्सराज का पुत्र वह नरवाहनदत्त क्षुब्ध हो उठा ॥६॥ 'अहो ! यह तो ब्रह्मा के सौन्दर्य-सृष्टि की विचित्र रचना है' इस प्रकार कहता हुआ वह युवराज मन्त्रियों के साथ उसके पास आ गया ॥७॥ वह भी स्नेह से स्निग्ध और तिरछी आँखों से उसे देखती थी। क्रमशः समीप जाकर उसने उस सुन्दरी से पूछा कि तू कौन है और यहाँ कैसे आई ? ॥८॥

शक्तियशा का कौशाम्बी में आगमन

यह सुनकर वह कन्या बोली 'सुनो मैं तुम्हें बताती हूँ। हिमाचल पर्वत पर कांचन शृंग नाम का सुवर्ण-निर्मित नगर है ॥९॥ वहाँ स्फटिकयश नाम का विद्याधरों का राजा है। वह बहुत धर्मात्मा है और दीन अनाथों एवं शरणागतों का पालन रक्षण करनेवाला है ॥१०॥