कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextइसलिए बुद्धि ही वास्तविक बल है। बुद्धिहीन व्यक्ति के पास बल होने पर भी उससे क्या लाभ ? इस सम्बन्ध में भी सिंह और शश (खरगोश) की एक कथा सुनो ॥९१॥
सिंह और शश की कथा
किसी जङ्गल में एकमात्र वीर और अपराजित सिंह रहता था। वह जंगल में जिस-जिस जीव को देखता था उसे मार डालता था ॥९२॥ तब एक बार जंगल के सभी मृग आदि पशुओं ने एकत्र होकर, उससे प्रार्थना की कि हमलोग तुम्हारे भोजन के लिए प्रतिदिन एक-एक जीव को भेजेंगे। एक साथ ही हम सब को मारकर तुम अपने ही स्वार्थ की हानि क्यों करते हो ? उन लोगों के इस प्रस्ताव को सिंह ने 'ठीक है' कहकर मान लिया ॥९३-९४॥ इस निश्चय के पश्चात् एक-एक जीव को प्रतिदिन जब वह खा रहा था तब एक दिन उसके लिए एक शश (खरगोश) की बारी आई ॥९५॥ सब जानवरों से भेजे गये उस शश ने जाते हुए सोचा कि धीर व्यक्ति वही है जो आपत्ति काल में भी नहीं घबराता ॥९६॥ इसलिए, अब मृत्यु के सिर पर मँडराते हुए भी एक युक्ति करता हूँ। ऐसा सोचकर वह शश देर करके सिंह के पास पहुँचा ॥९७॥ विलम्ब से आए हुये उसे देखकर सिंह बोला-'क्यों रे, तूने आज मेरे भोजन का समय क्यों बिता दिया ? अरे दुष्ट क्षुध करने न मिला और मैं तेरा भक्ष कर ही क्या सकता हूँ। इस प्रकार कहते हुए उस सिंह से वह विनम्र शश (खरगोश—बोला) ॥९८-९९॥ 'हे स्वामी मेरा दोष नहीं है। आज मैं अपने वश में नहीं रह गया था। आते हुए मार्ग में मुझे दूसरे सिंह ने देर तक रोकने के बाद छोड़ा ॥१००॥ यह सुनकर पूँछ को उठाकर हिलाता हुआ और कोप से आँखें लाल करके गुर्रारता हुआ वह सिंह बोला—'वह कौन दूसरा सिंह है ? तू उसे मुझे दिखा' ॥१०१॥ 'स्वामी आकर देखिए। यह कहकर पीछे आते हुए सिंह को वह शश उसे एक कुएँ के पास ले गया ॥१०२॥ और बोला—'इस कुएँ के अन्दर बैठे हुए उसे देखो। शश के ऐसा कहने पर सिंह ने कुएँ के भीतर देखा और स्वच्छ जल में अपनी परछाई को देखकर, अपनी गर्जना की प्रति ध्वनि को ही दूसरे सिंह की अपने से भी तेज गर्जना समझ ली ॥१०३-१०४॥
१ पञ्चतन्त्र में इस कथा का प्रारम्भ इस प्रकार होता है— बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम्। पश्य सिंहो मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः॥