कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextदशम लम्बक ८३७ तब धवलमुख ने बीरबाहु को यह कहकर शान्त किया और घर को लौटाया कि 'मंत्रिया न समझाकर राजा का क्रोध शान्त कर दिया' ॥२३३॥ तब धवलमुख ने अपनी स्त्री से कहा—'प्यारी तूने घर इन दोनों मित्रों का अन्तर देखा ! यह सुनकर उसकी स्त्री सन्तुष्ट हुई ॥२३४॥ इस प्रकार बाहरी शिष्टाचार (दिखावा) करनेवाले मित्र दूसरे होते हैं और सच्चे मित्र दूसरे । चिकनाहट समान होने पर भी तेल तेल है और घी घी ही है ॥२३५॥ गोमुख मंत्री इस प्रकार मूर्खों की कथा सुनाकर नरवाहनदत्त से फिर बोला ॥२३६॥ जलभीत मूर्ख की कथा एक मूर्ख पथिक ने प्यास से व्याकुल हो किसी प्रकार बीहड़ जंगल पार कर नदी के किनारे पहुँचकर भी पानी नहीं पिया और वह केवल जल की ओर ही देखता रहा ॥२३७॥ 'प्यास होकर भी पानी क्या नहीं पी रहे हो? किसी के इस प्रकार उससे पूछने पर वह मूर्ख बोला—'इतना पानी मैं कैसे पिऊँ'?॥२३८॥ 'यदि तू सब पानी न पियेगा तो क्या राजा तुम दंड देगा? इस प्रकार उसके द्वारा मजाक करने पर भी उस मूर्ख ने पानी नहीं पिया ॥२३९॥ इस प्रकार जिस कार्य को सम्पूर्ण रूप से किया जा सकता है, उसे मूर्ख जरा सा भी नहीं कर पाते ॥२४०॥ पुत्रघाती मूर्ख की कथा इस प्रकार जलभीत मूर्ख की कथा सुनी अब महाराज पुत्रघाती की कथा सुनो। बहुत पुत्रोंवाला एक दरिद्री पुरुष था। उसने एक पुत्र के मरने पर, दूसरे पुत्र को स्वयं मार डाला लोगों के पूछने पर कि 'तूने इस पुत्र को क्यों मार डाला? उसने उत्तर दिया कि 'यह बच्चा अकेला कैसे रहता? इसलिए, उसे दूसरा साथी भी दे दिया' ॥२४१-२४२॥ यह सुनकर उसकी निन्दा और हँसी करके लोगों ने उसे गाँव से निकाल दिया। इस प्रकार विचारहीन पुरुष और पशु दोनों ही समान होते हैं ॥२४३॥ भ्रातृमूर्ख की कथा
- राजन् तुमने पुत्रघाती की कथा सुनी अब भ्रातृमूर्ख की कथा सुनो। एक मूर्ख कुछ लोगों की मण्डली में बैठकर बात कर रहा था। इतने में किसी श्रेष्ठ पुरुष का दूर से ही आते देखकर वह बोला— यह मेरा भाई होता है। इसका पक्ष व हिसाबदार के रूप में हरण करना हूँ। परन्तु इसके साथ मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। ऐसा कहते हुए उस मूर्ख ने गन्धर्व को भी हँसा दिया ॥ २४- ४६॥
- स्वामिन् इस प्रकार मन्द की मूर्खता और स्वार्थ से अन्य व्यक्ति का अति विचित्रता होती । इस प्रकार आपने भ्रातृमूर्ख का कथा सुनी। अब कलाकारी के पुत्र की कथा सुनो॥ ४७॥