BharatKosha
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

Page 890 of 1079

Read in context
Page 890

दशम लम्बक ८४१ तब हँसते हुए दूसरे धोया ने कहा—'तू तो साहस और क्षोभ दोनों ही एक साथ सामने निभा रहा है। इस प्रकार प्रत्यक्ष व्यंग्य करते हुए भी मूर्ख उसको नहीं समझते ॥२६३-२६४॥ एक मूर्ख राजा की कथा अब कन्या को बढ़ानेवाले पिता की कहानी सुनो। एक राजा का उसके यहाँ एक सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई ॥२६५॥ वह अत्यन्त स्नेह के कारण शीघ्र ही उस कन्या को बड़ा करने के लिए उत्सुक था। उसने वैद्यों को बुलाकर उनसे प्रेमपूर्वक कहा ॥२६६॥ आप लोग ऐसी अच्छी ओषधि का प्रयोग कीजिए कि जिससे यह कन्या शीघ्र ही बढ़ जाय और किसी अच्छे पति को दे दी जाय ॥२६७॥ यह सुनकर, वे वैद्य उस मूर्ख राजा का धन ऐंठने के लिए बोले—'महाराज दवा तो है किन्तु वह यहाँ से दूर देशों में मिलती है ॥ २६८॥ जबतक हमलोग उसे मँगाते हैं तबतक यह कन्या अदृश्य (छिपाकर) रखी जाय। ओषधि का ऐसा ही विधान है ॥२६९॥ ऐसा कहकर उन्होंने ओषधि-प्राप्ति की आशा में कन्या को अनेक वर्षों तक गुप्त रखा ॥२७०॥ जब कन्या यौवनावस्था में आ गई तब उन्होंने उसे ओषधि से बड़ी हुई बताकर राजा को दिखाया और उससे पर्याप्त धन प्राप्त किया ॥२७१॥ राजा ने भी उस वैद्य को धन से सन्तुष्ट कर दिया। महाराज इस बहाने से धूर्तजन पण्डितों को ठगते हैं ॥ २७२॥ अधेले के लिए धन लेने खर्च करनेवाले धूर्त कंजूस की कथा और भी अंधकार को प्राप्त कराने में पण्डित एक धूर्त की कथा सुनो। किसी नगर में अपने को बहुत चतुर माननेवाला एक मूर्ख था ॥ २७३॥ उसके यहाँ चोर के रहनेवाले एक पुरुष ने एक बार जब नौकरी करके जीविका निर्वाह न होने के कारण (वेतन न मिलने से) नौकरी छोड़ दी और वह अपने घर चला गया ॥ २७४॥ उसके चले जाने पर उसने अपने नवीन नौकर से पूछा—'वह नौकर क्या मुझसे कुछ लेता नहीं था?' उसने कहा—'हाँ, एक अधेला तो लेता है' ॥ २७५॥ यह सुन उस कंजूस ने अपने नये नौकर से कहा-'अरे भाई! विचारे उसके घर पर जाकर अधेला उससे वसूल करके ले आओ' ॥ २७६॥ और नौकर के साथ में अपनी सर्वस्व सम्पत्ति का खर्च करता हुआ हँसी का पात्र बन गया ॥ २७७॥ १०६