कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextद्वादश लम्बक ८६७ इस प्रकार, उस दुष्टा पत्नी की दगाबाजी बात सुनकर प्रसन्न वह बढ़ई खाट के नीचे से निकलकर अपने शिष्य से बोला- आज तुमने देख लिया इसलिए तुम साक्षी हो कि यह स्त्री मेरी कैसी भक्त है। यह मुझको ही अपना पति समझती है। उसने इसे तो अपने स्वभावानुसार अपना यार बनाया है। अतः मैं इसे अपने सिर पर उठा लेना चाहता हूँ ॥११३-११४॥ ऐसा कहकर शिष्य के साथ उसने यार-सहित अपनी स्त्री की चारपाई को सिर पर उठा लिया ॥११५॥ इस प्रकार, अपनी आँखों के सामने अपराध देखकर भी झूठी सान्त्वना से मूर्ख व्यक्ति प्रसन्न हो जाता है। और वह विचारहीन व्यक्ति संसार में हँसी का पात्र बन जाता है ॥११६॥ इसलिए, शत्रु के व्यक्ति इस चिरजीवी की तुम्हें रक्षा न करनी चाहिए। यह उपेक्षित व्यक्ति है, रोग के समान शीघ्र नष्ट कर देना चाहिए ॥११७॥ रक्ताक्ष से इस प्रकार सुनकर, उलूकराज इस प्रकार उससे बोला- 'यह सज्जन चिरजीवी हमारा हित करता हुआ भी इस स्थिति को पहुँचा है ॥११८॥ तब इसकी रक्षा क्यों न की जाय फिर यह अकेला हमारा बिगाड़ ही क्या सकता है ? इस प्रकार बोलकर उलूकराज ने मंत्री का कथन काट दिया ॥११९॥ उसके बाद उलूकराज ने चिरजीवी कौए को आश्वासन दिया। तब चिरजीवी ने उलूकराज से निवेदन किया ॥१२०॥ 'इस अवस्था में मेरे जीने से क्या लाभ है ? इसलिए मुझे लकड़ियाँ दिलाओ जिससे मैं आग में जल मरूँ ॥१२१॥ और, मैं भगवान् से भी यही प्रार्थना करूँ कि काकराज का बदला लेने के लिए वह मुझे उलूक-योनि में जन्म दें' ॥१२२॥ ऐसा कहनेवाले चिरजीवी से रक्ताक्ष हँसकर बोला- 'हमारे स्वामी की कृपा से तू पूर्ण स्वस्थ है आग से क्या काम ?॥१२३॥ जबतक तू कौआ है तबतक उल्लू न बनेगा। विधाता ने जिसे जैसा बनाया है वह वैसा ही रहेगा' (इस प्रसंग में एक कथा सुनो।) ॥१२४॥ प्राचीन काल में किसी मुनि ने बाज के हाथ से छूटी हुई किसी चुहिया को पाकर दया करके अपने तपोबल से उसे कन्या बना दिया। अपने आश्रम में पालन-पोषण करके बढ़ाई गई और युवावस्था को प्राप्त उस कन्या को बलवान् पुरुष को देने के लिए मुनि ने सूर्य को बुलाया और कहा कि सबसे अधिक बलवान् को ही मैं यह कन्या देना चाहता हूँ। इसलिए तुम मेरी कन्या से विवाह करो। तब सूर्य ने ऋषि से कहा ॥१२५-१२७॥