कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextद्वादश लम्बक ८८१ महिषीमूर्ख की कथा कुछ गांव के लोगों ने किसी गँवार का भैंसा गांव के बाहर भीलों की बस्ती में ले जाकर वट-वृक्ष के नीचे मारकर खा लिया ॥२१३॥ उस भैंसावाले ने जाकर राजा से निवेदन किया। तदनन्तर, राजा ने भैंसा खानेवाले उन सभी गांववालों को बुलवाया ॥२१४॥ उनके सामने भैंसावाला गँवार बोला—'इन लोगों ने मेरे देखते-देखते मेरे भैंसे को तालाब के पास वटवृक्ष के नीचे मारकर खा लिया। यह सुनकर उनमें से एक वृद्ध मूर्ख ने कहा— 'इस गांव में न तो कोई तालाब है और न वट का ही वृक्ष इसलिए यह झूठ बोलता है। हमने इसका भैंसा कहाँ मारा और कहाँ खाया? ॥२१५ २१७॥ यह सुनकर भैंसावाला बोला—'तुम्हारे गांव की पूर्व दिशा में तालाब और वट का वृक्ष क्या नहीं है? ॥२१८॥ 'अष्टमी तिथि को तुमलोगों ने मेरे भैंसे को खाया है। उसके इस प्रकार कहने पर वह वृद्ध मूर्ख फिर बोला—'हमारे गांव में पूर्व दिशा ही नहीं है और न अष्टमी तिथि ही है। यह सुनकर हँसते हुए राजा ने उस मूर्ख को उत्साहित करते हुए कहा—'तू सच बोलनेवाला है, कुछ भी झूठ नहीं बोलता। अतः मुझे सच बता—'तुमने भैंसा खाया है या नहीं? ॥२१९ २२१॥ यह सुनकर वह मूर्ख बोला—'पिता के मरने के तीन वर्षों पश्चात् मैं उत्पन्न हुआ हूँ और उसी पिता ने मुझे यह चतुराई सिखाई है, इसलिए महाराज मैं झूठ कभी नहीं बोलता। हम लोगों ने इसका भैंसा खाया है, किन्तु और दूसरी बात जो यह कहता है, वह झूठी है। ॥२२२-२२३॥ यह सुनकर अपने अनुचरों के साथ राजा हँसी को न रोक सका और उसने भैंसावाले को मूल्य दिलाकर उन गँवारों को दंड दिया ॥२२४॥ मूर्खजन अपनी मूर्खता के अभिमान से अपने प्रति विश्वास कराने के लिए जो छिपाने योग्य नहीं है उसे छिपाते हैं और जो छिपाने योग्य है उसे प्रकट कर डालते हैं ॥२२५॥ किसी एक दरिद्र से उसकी युवती स्त्री बोली—'मैं एक उत्सव में अपने पिता के घर निमन्त्रित हूँ। अतः, कल प्रातः मैं वहाँ जाऊँगी ॥२२६॥ १११