कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)
Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation
by स्वामी महेश्वरानन्द गिरि
Source: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (origin)
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Read in context३ ।। शान्तिमन्त्रः ।। ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता, मनो से वाचि प्रतिष्ठितम् । आवीरावीर्म एधि वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः ।।१।। ॐ। मेरे वाणी और मन परस्पर एक-दूसरे में प्रतिष्ठित हों। प्रकाशमान परमात्मतत्त्व मुझे साक्षात् हो। वाणी वेद को और मन वेदार्थ को मुझ तक पहुँचाये। सुने हुए को मैं भूलूँ नहीं।।१।। अनेनाधीतेन अहोरात्रान् सन्दधामि। ऋतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि। तन्मामवतु। तद्वक्तारमवतु। अवतु मामवतु वक्तारम्। ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ।।२।। इस पढ़े हुए से मैं दिन-रात एक कर दूँ। मैं ऋत और सत्य ही बोलूँ। परमात्मा मेरी और वक्ता की रक्षा करे। त्रिविध ताप शांत हों।।२।। अथ प्रथमोध्यायः चित्रो ह वै गार्ग्यायणिर्यक्ष्यमाण आरुणिं वव्रे स ह पुत्रं श्वेतकेतुं प्रजिघाय याजयेति तं हासीनं पप्रच्छ गौतमस्य पुत्रास्ते संवृतं लोके यस्मिन्माधस्यस्यन्यमहो बद्ध्वा तस्य लोके धास्यसीति स होवाच नाहमेतद्वेद हन्ताचार्यं पृच्छानीति ।।३।। गार्ग्य का पुत्र चित्र यज्ञ करने वाला था। उसने यज्ञ कराने के लिए आरुणि को पसंद किया। आरुणि ने स्वयं न जाकर अपने बदले में अपने पुत्र श्वेतकेतु को भेजा। जब वह चित्र के पास आया तब चित्र ने पूछा "तू गौतम का पुत्र है, क्या इस लोक में कोई ऐसा गुप्त स्थान है कि जहां तू यज्ञ करके मुझे स्थापित कर सकेगा? अथवा अचिरादि मार्ग से जिस लोक में जाया जाता है उस लोक में क्या तू