भारतकोश
कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation

स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा

स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished56 पृष्ठ

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आमुख ऋग्वेद की कौषीतकी शाखा के ब्राह्मण भाग में आनेवाली उपनिषद् पर यद्यपि आचार्य शंकरभगवत्पाद का भाष्य उपलब्ध नहीं है, तथापि शंकरानन्द आदि ने उस पर विस्तृत व्याख्यान किया है, तथा ब्रह्मसूत्र में इस पर अधिकरण रचना भी है। इससे इसका महत्त्व सुस्पष्ट है। इसकी आत्मपुराण में तो अत्यधिक विस्तार से व्याख्या उपलब्ध हैं इसमें इन्द्र का प्रधान उपदेश है कि प्राण से प्रज्ञात्मा के अभेद रूप से मुझ इन्द्र को जानो। प्राणरूप से पैर के द्वारा व प्रज्ञात्मा रूप से मूर्धा के द्वारा परमशिव का प्रवेश है। अतः ज्ञान क्रियात्मक ही हिरण्यगर्भ है। सूक्ष्म शरीर ही बाध होने पर तैजस् कहा जाता है। विराट् की जागृत जीव से जैसे व्यापक होने से एकता है, वैसे ही व्यापक उपाधि वाले हिरण्यगर्भ की है। सूक्ष्म शरीर ही बाध होने पर तैजस् कहा जाता हैं विराट की जागृत जीव से जैसे व्यापक होने से एकता है, वैसे ही व्यापक उपाधि वाले हिरण्यगर्भ से स्वप्न जीव की एकता है, जब इस प्रकार कार्य उपाधि वाले की एकता सिद्ध है तो, जो वैसे भी अव्यक्त होने से भेदग्रस्त नहीं है, उस की एकता की सिद्धि सुगम होने से उस उपाधि वाले प्राज्ञ व ईश्वर की एकता तो अति स्फुट है। अजातशत्रु व गार्ग्य का संवाद इस उपनिषद् व बृहदारण्यकोपनिषद् में प्रायः एक से है। इसमें व्यतिरेक द्वारा उपास्य व ज्ञेय की एकता का सुन्दर प्रतिपादन है। इस प्रकार कौषीतकी ब्राह्मण उपनिषद् के अभिप्राय के ज्ञान से वेदान्तवेद्य का ज्ञान सरलता से हो जाता है। हिन्दी अनुवाद से यह वेदभाषा के अनभिज्ञों का भी उपकारक हो, अतः श्री बिशनदास मेहता ने इसका प्रकाशन किया हैं साधक इससे उपकृत हों। भगवत्पादीयो स्वामी महेशानन्दगिरिः

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