कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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नादेयं सारसमानूपं च नागवनं विदितपर्यन्तप्रवेशनिष्कासनं नागवनपालैः पालयेत् । हस्तिघातिनं हन्युः । दन्तयुगं स्वयं मृतस्याहरतः सपादचतुष्पणो लाभः ।
(१) नागवनपाला हस्तिपकपादपाशिकसैमिकवनचरकपार्किकर्मिक-सखाहस्तिमूत्रपुरीषच्छन्नगन्धा भल्लातकीशाखाप्रतिच्छन्नाः पञ्चभिः सप्त-भिर्वा हस्तिबन्धकीभिः सह चरन्तः शय्यास्थानपद्याण्डकूलपातोद्देशेन हस्तिकुलपर्यग्रं विद्युः ।
(२) यूथचरमेकचरं निर्यूथं यूथपतिं हस्तिनं व्यालं मत्तं पोतं बद्ध-मुक्तं च निबन्धेन विद्युः । अनीकस्थप्रमाणैः प्रशस्तव्याञ्जनाचारान्हस्तिनो गृह्णीयुः । हस्तिप्रधानो हि विजयो राज्ञाम् । परानीकव्यूहदुर्गस्कन्धावार-प्रमर्दना ह्यतिप्रमाणशरीराः प्राणहरकर्माणो हस्तिन इति ।
अपने सहयोगी वनपालों के सहयोग से पर्वत, नदी, जलाशय तथा किसी जलमय स्थान से होकर हस्तिवनों के अंदर जाने वाले मार्गों की भली-भाँति देख-रेख रखे । हाथियों को मारने वाले प्रत्येक व्यक्ति को प्राणदण्ड की सजा मिलनी चाहिए । मृतक हाथी के दाँतों को उखाड़कर जो स्वयं ही राजपुरुषों के सुपुर्द कर दे, उसे सवा चार पण पुरस्कार स्वरूप दिया जाना चाहिए ।
( १ ) हस्तिवन के रक्षकों को चाहिए कि वे हस्तिपक ( महावत ), पादपाशिक ( हाथियों को जाल में फँसाने वाला ), सैमिक ( सीमारक्षक ) वनचरक ( जंगली मनुष्य ) और पारिकर्मिक ( हाथियों की परिचर्या में निपुण ) आदि पुरुषों को साथ लेकर जंगल में हाथियों के समूह का पता लगायें । अपने साथ वे हाथी के मल-मूत्र के गंध के समान किसी वस्तु को, हाथियों को वश में करने वाली पाँच-सात हथिनियों को भी साथ में लेकर और स्वयं को भल्लातकी ( भिलावे ) की शाखा में छिपाये हुए, हाथियों के पड़ाव, उनके पैरों के निशान, उनके मल-मूत्र त्यागने की जगह और उनके द्वारा गिराये गए नदी-कगारों आदि का सुराग लेकर हस्तिसमूहों का पता लगायें ।
( २ ) झुंड के साथ घूमने वाले, अकेले विचरण करने वाले, झुंड से फूटे हुए, झुंडप्रमुख, दुष्टप्रकृति, उन्मत्त, शिशुहस्ति, बंधनमुक्त आदि हाथियों से संबंधित जितने भी विवरण हैं, उनकी जानकारी, हस्तिवनरक्षक अपनी गणनापुस्तक ( स्टाकबुक ) से प्राप्त करें । हस्तिविद्या में निपुण पुरुषों के निर्देशानुसार श्रेष्ठ लक्षणों से युक्त हाथियों को ही पकड़ना चाहिए, क्योंकि हाथी ही राजा की विजय के प्रधान साधन हैं । भारी भरकम हाथी ही शत्रुसेना, उसकी व्यूह-रचना, उसके दुर्ग तथा उसकी छावनियों को कुचलने वाले और उसके प्राणों तक को ले लेने वाले होते हैं ।