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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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१२६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ दूसरा अधिकरण

(१) स्थूलं वृत्तं निस्तलं भ्राजिष्णु श्वेतं गुरु स्निग्धं देशविद्धं च प्रशस्तम् । (२) शीर्षकमुपशीर्षकं प्रकाण्डकमवघाटकं तरलप्रतिबन्धं चेति यष्टिप्रभेदाः । (३) यष्टीनामष्टसहस्रमिन्द्रच्छन्दः । ततोऽर्धं विजयच्छन्दः । शतं देवच्छन्दः । चतुष्षष्टिरर्धहारः । चतुष्पञ्चाशद्रश्मिकलापः । द्वात्रिंशद्-गुच्छः । सप्तविंशतिर्नक्षत्रमाला । चतुर्विंशतिरर्धगुच्छः । विंशतिर्माण-वकः । ततोऽर्धमर्धमाणवकः । एत एव मणिमध्यास्तन्माणवका भवन्ति । एकशीर्षकः शुद्धो हारः । तद्वच्छेषाः । मणिमध्योऽर्धमाणवकस्त्रिफलकः फलकहारः पञ्चफलको वा । सूत्रमेकावली शुद्धा । सैव मणिमध्या यष्टिः ।

(१) मोटा, गोल, तलरहित, दीप्तिमान, श्वेत, वजनी, चिकना और स्थान पर विधा मोती उत्तम कोटि का है ।

(२) यष्टि अर्थात् मोतियों की माला के कई नाम हैं, शीर्षक (जिसमें दो छोटे मोतियों के बीच में एक बड़ा मोती पिरोया गया हो), उपशीर्षक (जिसमें दो छोटे मोतियों के बाद एक बड़ा मोती हो), प्रकाण्डक (जिसमें चार छोटे मोतियों के बाद एक बड़ा मोती हो), अवघाटक (जिस माला के बीच में एक बड़ा मोती और उसके दोनों ओर उत्तरोत्तर छोटे-छोटे मोती हों) और तरलप्रतिबन्ध (जिसमें सभी मोती एक समान लगे हों) ।

(३) एक हजार आठ लड़ों की माला को इन्द्रच्छन्द, उससे आधी पांच सौ चार लड़ों की माला को विजयच्छन्द, सौ लड़ों की माला को देवच्छन्द, चौंसठ लड़ों की माला को अर्धहार, चौवन लड़ों की माला को रश्मिकलाप, बत्तीस लड़ों की माला को गुच्छ, सत्ताईस लड़ों की माला को नक्षत्रमाला, चौबीस लड़ों की माला को अर्धगुच्छ, बीस लड़ों की माला को माणवक, और उससे आधा दस लड़ों की माला को अर्धमाणवक कहा जाता है । इन्हीं मालाओं के बीच में यदि मणि पिरो दी जाय तो उनके नाम के आगे माणवक शब्द जुड़ जाता है । यदि इन्द्रच्छन्द आदि मालाओं में सभी मोती शीर्षक के समान पिरोये जाते हैं तो उनका नाम इन्द्रच्छन्दशीर्षक शुद्धहार, विजयच्छन्दशीर्षक शुद्धहार कहा जाता है । इसी प्रकार यदि इन्द्रच्छन्द आदि में सभी मोती उपशीर्षक के समान पिरोये गए हों तो उसे इन्द्रच्छन्दोपशीर्षकशुद्धहार कहा जाता है । यदि इन शुद्धहारों के बीच में मणि पिरो दी जाय तो, बजाय शुद्धहार के वे अर्धमाणवक कहलाते हैं और तब उनका पूरा नामकरण होता है इन्द्रच्छन्दशीर्षकार्धमाणवक । इसी प्रकार उपशीर्षक आदि के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए । दस लड़ियों की माला में यदि सोने के तीन या पाँच दाने पिरो दिए गए हों तो उसे फलकहार कहा जाता है । एक ही लड़ी की मोती की माला का नाम सूत्र है । यदि उसके बीच में मणि पिरो दी जाय तो उसे ही