BharatKosha
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 213 of 918

Read in context
Page 213

प्र० २७ : अ० ११ ] रत्नों की परीक्षा १२९

(१) सभाराष्ट्रकं मध्यमराष्ट्रकं कास्तीरराष्ट्रकं श्रीकटनकं मणिमन्त-
कमिन्द्रवानकं च वज्रम् ।
(२) खनिः स्रोतः प्रकीर्णकं च योनयः ।
(३) मार्जाराक्षकं च शिरीषपुष्पकं गोमूत्रकं गामेदकं शुद्धस्फटिकं मूलाटीपुष्पकवर्णं मणिवर्णानामन्यतमवर्णमिति वज्रवर्णाः ।
(४) स्थूलं स्निग्धं गुरु प्रहारसहं समकोटिकं भाजनलेखि तर्कुभ्रामि भ्राजिष्णु च प्रशस्तम् ।
(५) नष्टकोणं निरश्रिपाश्र्वापवृत्तं च अप्रशस्तम् ।
(६) प्रबालकं आलकन्दकं वैवर्णिकं च रक्तं पद्मरागं च करटगर्भिणि-
कावर्जमिति ।
(७) चन्दनम्—सातनं रक्तं भूमिगन्धि । गोशीर्षकं कालताम्रं मत्स्य-


(१) हीरा के छह उत्पत्ति स्थान है : १. सभाराष्ट्रक (बरार, बम्बई प्रदेश में उत्पन्न), २. मध्यमराष्ट्रक (कोशल देश में उत्पन्न), ३. कास्तीरराष्ट्रक (कास्तीर देश में उत्पन्न), ४. श्रीकटनक (श्रीकटन पर्वत पर उत्पन्न) : ५. मणिमंतक (उत्तरस्थ मणिमंत पर्वत में उत्पन्न) और ६. इन्द्रवानक (कलिंग देश में उत्पन्न)।

(२) इनके अतिरिक्त खदान, विशेष जलप्रवाह और हाथी दाँत की जड़ आदि भी हीरा के उत्पत्तिस्थान हैं। खान और जलप्रवाह आदि के अन्य स्थानों में उत्पन्न हीरा को प्रकीर्णक रहते हैं।

(३) हीरा के अनेक आकार-प्रकार हैं : बिलाव की आँख के समान, शिरीष पुष्प की आकृति का, गोमूत्र के समान, गोरोचन की भाँति, सर्वथा स्वच्छ, श्वेत, मुलहटी के फूल जैसा, और मणियों की आकृति का।

(४) मोटा; वजनी, घन की चोट सहने वाला, समकोण पानी से भरे पीतल के बर्तन में उसको हिलाने से लकीरें डाल देने वाला, चर्खे में लगे तकुवे के तरह घूमने वाला और चमकदार हीरा उत्तम कोटि का है।

(५) नष्टकोण, नुकीले कोनों से रहित और छोटे-बड़े कोनों वाला हीरा दूषित समझा जाता है।

(६) प्रवाल (मूंगा) के दो उत्पत्ति स्थान हैं—१. आलकन्दक (अलकन्द नामक स्थान से उत्पन्न) और २. वैवर्णिक (यूनान के समीपवर्ती विवर्ण नामक समुद्रतल में उत्पन्न)। प्रवाह के दो रंग होते हैं : १. रक्त और २. कमल। वह कीड़े का खाया हुआ तथा बीच में मोटा या उठा हुआ नहीं होना चाहिए।

(७) चन्दन के सोलह उत्पत्ति स्थान, नौ रंग, छह गन्ध और ग्यारह गुण होते हैं। उत्पत्तिस्थान—१. सातन देश में उत्पन्न चन्दन लाल रंग का होता है और

९ कौ०