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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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१२८कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ दूसरा अधिकरण

(१) शुद्धस्फटिकः मूलाटवर्णः शीतवृष्टिः सूर्यकान्तश्चेति मणयः । (२) षडश्रश्चतुरश्रो वृत्तो वा, तीव्ररागः संस्थानवानच्छः स्निग्धो गुरुरर्चिष्मानन्तर्गतप्रभः प्रभानुलेपी चेति मणिगुणाः । (३) मन्दरागप्रभः सशर्करः पुष्पच्छिद्रः खण्डो दुर्विद्धो लेखाकीर्ण इति दोषाः । (४) विमलकः सस्यकोऽञ्जनमूलकः पित्तकः सुलभको लोहिताक्षो मृगाश्मको ज्योतीरसको मैलेयक आहिच्छत्रकः कूर्पः प्रतिकूर्पः सुगन्धि-कूर्पः क्षीरपकः शुक्तिचूर्णकः शिलाप्रवालकः पुलकः शुक्रपुलक इत्यन्तर-जातयः । (५) शेषाः काचमणयः ।


( १ ) स्फटिक मणि चार प्रकार की होती है : १. शुद्धस्फटिक (स्वच्छ, श्वेत) २. मूलाटवर्ण ( मक्खन निकाले हुए मट्ठे की भाँति ), ३. शीतवृष्टि ( चन्द्रमा के किरणों से पिघलने वाली ) और ४. सूर्यकान्त ( सूर्य किरणों का स्पर्श पाकर आग उगलने वाली ) ।

( २ ) मणियों में ग्यारह प्रकार के गुण होते हैं : १. षड्ज ( छह कोनों वाली ) २. चतुरस्र ( चार कोनों वाली ), ३. वृत्त ( गोलाकार ); ४. गहरे रंगवाली चमकदार, ५. आभूषण में लगाने योग्य, ६. निर्मल, ७. चिकनी, ८. भारी, ९. दीप्तियुक्त, १०. चञ्चलकान्तियुक्त और ११. अपनी कांति से पास की वस्तु को प्रकाशित कर देने वाली ( प्रभानुलेपी ) ।

( ३ ) मणियों में सात प्रकार के दोष पाये जाते हैं : १. हलके रंग वाली, २. हलकी प्रभावानी, ३. खुरदरी, ४. छोटे छिद्र वाली, ५. कटी हुई, ९. उपयुक्त स्थान पर न वेधी हुई और ७. विभिन्न रेखाओं वाली ।

( ४ ) मणियों की अठारह प्रकार की उपजातियाँ हैं—१. विमलक ( श्वेत-हरित वर्णों से मिश्रित ), २. सस्यक ( नीली ), ३. अंजनमूलक ( नील-श्याम वर्ण-मिश्रित ), ४. पित्तक ( गाय के पित्त के समान ), ५. सुलभक ( श्वेत ), ६. लोहिताक्ष ( किनारों पर लाल और केन्द्र में श्याम ), ७ मृगाश्मक ( श्वेत-अरुण-मिश्रित ), ८. ज्योतीरसक ( श्वेत-अरुण-मिश्रित ), ६. मैलेयक ( शिंगरफ की भाँति) १० आहिच्छत्रक ( फीके रंग वाली ), ११. कूर्प ( खुरदरी ), १२. प्रतिकूर्प ( दागी ) १३. सुगन्धिकूर्प ( मूंग-वर्णी ), १४. क्षीरपक ( दुग्ध धवल ), १५. शुक्ति चूर्णक ( अनेक रंगों वाली ), १६. शिलाप्रवालक ( मूंगे के समान ), १७. पुलक ( केंद्र में काली ) और १८. शुक्रपुलक ( केन्द्र में श्वेत ) ।

( ५ ) इनके अतिरिक्त जो मणियाँ हों वे काँच के समान निम्न कोटि की होती है ।