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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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प्र० २८ : अ० १२ ] खनिजसम्बन्धी कार्य १३९

(१) ऊषरकर्बुरः पक्वलोष्ठवर्णो वा त्रपुधातुः । (२) कुरुम्बः पाण्डुरोहितः सिन्दुवारपुष्पवर्णो वा तीक्ष्णधातुः । (३) काकाण्डभुजपत्रवर्णो वा वैकृन्तकधातुः । (४) अच्छः स्निग्धः सप्रभो घोषवान् शीततीव्रस्तनुरागश्च मणिधातुः । (५) धातुसमुत्थं तज्जातकर्मान्तेषु प्रयोजयेत् । (६) कृतभाण्डव्यवहारमेकमुखम्, अत्ययं चान्यत्रकर्तृक्रेतृविक्रेतृणां स्थापयेत् । (७) आकरिकमपहरन्तमष्टगुणं दापयेदन्यत्र रत्नेभ्यः । (८) स्तेनमनिसृष्टोपजीविनं च बद्ध्वा कर्म कारयेद्, दण्डोपकारिणं च ।


( १ ) जो भूमि-भाग ऊसर जमीन की भांति कुछ सफेदी लिये हो, अथवा पके हुए ढेले के रंग का हो, वहाँ सफेद सीसे की खान समझनी चाहिए ।

( २ ) जो भूमि भाग चिकने पत्थरों वाला, कुछ सफेदी एवं लाली लिये हो, अथवा उसकी आकृति निर्गुण्डी के पुष्प से मिलती हो, वहाँ लोहे की खान समझनी चाहिए ।

( ३ ) जो भूमि-भाग कौवे के अण्डे या भोजपत्र की आकृति का हो, वहाँ इस्पाती लोहे की खान समझनी चाहिए ।

( ४ ) जो भूमि-भाग, इतना स्वच्छ हो कि जिसमें परछाई दिखाई दे, जो चिकना, दीप्त, शब्द देने वाला, अत्यन्त शीतल और फीके रंग वाला हो, वहाँ मणियों की खान जाननी चाहिए ।

( ५ ) खान से प्राप्त सुवर्ण आदि के लाभ को पुनः खान के कार्यों में लगाकर अधिक लाभ प्राप्त करना चाहिए ।

( ६ ) किसी एक नियत स्थान में ही सुवर्ण आदि धातुओं की बिक्री की व्यवस्था करनी चाहिए, उससे अन्यत्र बेचने वाले व्यक्तियों को दण्डित किया जाना चाहिए ।

( ७ ) धातुओं की चोरी करने वाले व्यक्ति पर, चोरी का आठ गुना दण्ड करना चाहिए, किन्तु यदि वह रत्नों की चोरी करता है तो उसको प्राणदण्ड दिया जाना चाहिए ।

( ८ ) जो व्यक्ति चोरी करे अथवा राजा की अनुमति के बिना धातुओं का व्यापार करे, उसे पकड़कर खान के कार्य में लगा देना चाहिए, और जिस व्यक्ति को न्यायालय ने प्राणदण्ड की सजा दी हो, किन्तु कारणवश वह उस दण्ड को पूरा न कर सके तो, ऐसे व्यक्ति को भी खान में लगा देना चाहिए ।