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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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१४०कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ दूसरा अधिकरण

(१) व्ययक्रियाभारिकमाकरं भागेन प्रक्रयेण वा दद्यात्, लाघविकामात्मना कारयेत् । (२) लोहाध्यक्षः ताम्रसीसत्रपुवैकृन्तकारकूटवृत्तकंसताललोहकर्मान्तान् कारयेत्, लोहभाण्डव्यवहारं च । (३) लक्षणाध्यक्षः चतुर्भागताम्रं रूप्यरूपं तीक्ष्णत्रपुसीसाञ्जनानामन्यतमाषबीजयुक्तं कारयेत् पणम्, अर्धपणं पादमष्टभागमिति । पादाजीवं ताम्ररूपं माषकंमर्धमाषकं काकणीमर्धकाकणीमिति । (४) रूपदर्शकः पणयात्रां व्यावहारिकों कोशप्रवेश्यां च स्थापयेत् ।


( १ ) यदि खान पर लोगों का कर्जा चढ़ गया हो और उस कर्जा को चुकता कर देने पर ही लाभ निर्भर हो तो, खान के अध्यक्ष को चाहिए कि वह थोड़ी-थोड़ी किस्तों में उस कर्जे को चुकता कर दे अथवा राजा से, कुछ सोना देकर, एक मुस्त रकम देकर, वह उस कर्जे को सर्वथा चुकता कर दे । यदि थोड़ी पूंजी या थोड़े श्रम से कार्य पूरा हो सकता है तो, अध्यक्ष स्वयं ही वैसा कर दे ।

( २ ) अध्यक्ष को चाहिए कि वह ताँबा, सीसा, त्रपु, वैकृंतक, आरकूट, वृत्त, कंस और ताल आदि अन्य प्रकार के लोहों का कार्य अपनी देख-रेख के कराये । लोहे की बनी वस्तुओं एवं तत्सम्बन्धी कार्य-व्यवहार को भी वह अपनी निगरानी में करवावे ।

( ३ ) टकसाल के अध्यक्ष ( लक्षणाध्यक्ष ) को चाहिए कि वह पण, अर्धपण, पादपण तथा अष्टभागपण नामक चार चाँदी के सिक्कों को विधिपूर्वक ढलवावे । १६ माष का एक पण होता है । उसमें ४ माष ताँबा, लोहा, राँगा, सीसा तथा अंजन, इनमें से कोई भी एक माष, बाकी ११ माष चाँदी होनी चाहिए । इसी हिसाब से अर्धपण ( अठन्नी ), पादपण ( चवन्नी ) और अष्टभागपण ( दुअन्नी ) आदि को ढलवावे । पण के चौथे हिस्से को व्यवहार में लाने के लिए ताँबे का एक अलग सिक्का होना चाहिए, जिसमें चौथाई हिस्सा चाँदी एक हिस्सा लोहा, सीसा आदि में से कोई एक और ग्यारह माष ताँबा होना चाहिए, इस सिक्के का नाम मापक है, जिसका वजन सोलह माष होता है, इसका भी अर्धमापक सिक्का तैयार करवाना चाहिए, इसके पादमापक तथा अष्टभागमापक के लिए 'काकणी' तथा 'अर्धकाकणी' नामक सिक्कों को बनवाना चाहिए ।

( ४ ) सिक्कों के विशेषज्ञ को इस बात की व्यवस्था कर देनी चाहिए कि कौन-सा सिक्का चलाया जाय और कौन-सा सिक्का खजाने में जमा किया जाय । सौ पण पर जो आठ पण राज्यभाग जनता से लिया जाता है, उसका नाम रूपिक है;