कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context| प्रकरण ६९ | \multirow{2}{*}{\Large दासकर्मकरकल्पम्} |
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| अध्याय १३ |
(१) उदरदासवर्जमार्यप्राणमप्राप्तव्यवहारं शूद्रं विक्रयाधानं नयतः स्वजनस्य द्वादशपणो दण्डः। वैश्यं द्विगुणः। क्षत्रियं त्रिगुणः। ब्राह्मणं चतुर्गुणः। परजनस्य पूर्वमध्यमोत्तमवधा दण्डाः क्रेतृश्रोतॄणां च। (२) म्लेच्छानामदोषः प्रजां विक्रेतुमाधातुं वा। न त्वेवार्यस्य दासभावः। (३) अथवार्यमाधाय कुलबन्धन आर्याणामापदि निष्क्रयं चाधिगम्य बालं साहाय्यदातारं वा पूर्वं निष्क्रीणीरन्। (४) सकृदात्माधाता निष्पतितः सीदेत्। द्विरन्येनाहितकः। सकृदुभौ परविषयाभिमुखौ।
दास और श्रमिक सम्बन्धी नियम
( १ ) उदरदास को छोड़कर आर्यों के प्राणभूत नाबालिग शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण को यदि उनके ही परिवार का कोई व्यक्ति बेचे या गिरवी रखे तो उन-पर क्रमशः बारह पण, चौबीस पण, छत्तीस पण और अड़तालीस पण का दण्ड किया जाय। यदि इन्हीं नाबालिग शूद्र आदि को यदि कोई दूसरा व्यक्ति बेचे या गिरवी रखे तो उक्त क्रम से उनको प्रथम, मध्यम, उत्तम साहस और प्राणवध का दण्ड दिया जाय। यही दण्ड खरीदारों और इस मामले में गवाही देने वालों को भी दिया जाय।
( २ ) म्लेच्छ लोग अपनी सन्तान को बेच और गिरवी रख सकते हैं, इसमें कोई दोष नहीं है; परन्तु आर्यजाति किसी हालत में भी गुलाम नहीं बनाई जा सकती है।
( ३ ) यदि सारा परिवार गिरफ्तार हो गया हो या बहुत सारे आर्यों पर विपत्ति आ पड़ी हो तो उस दशा में आर्य को गिरवी रखा जा सकता है और जब छुड़ाने योग्य धन प्राप्त हो जाय तो पहिले बालक को या सहायक को मुक्त करना चाहिए।
( ४ ) जो व्यक्ति अपने आपको गिरवी रखा चुका हो, यदि एक बार भी वह वहाँ से भाग निकले तो उसे आजीवन गुलाम बनाकर रखा जाय। जो व्यक्ति दूसरों के द्वारा गिरवी रखा गया हो, यदि वह दो बार भाग जाय तो उसे सदा के लिए दास